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31 दिसंबर 2010

छात्रवृत्ति देना भूला लखनऊ विश्वविद्यालय

लखनऊ विश्वविद्यालय ने साठ हजार रुपये का हिसाब तो दिया, लेकिन छात्रवृत्ति के रूप में यह धन पात्र छात्राओं तक पहुंचाने का वादा भूल गया। यह मामला है बेटी के नाम पर छात्रवृत्ति शुरू करने की उम्मीद लेकर अधिकारियों के चक्कर लगा रहे डॉ. रामाश्रय सिंह का। नौ साल भटकने के बाद गत सितंबर माह में जब मामले ने तूल पकड़ा तो लविवि प्रशासन चार कदम चला, छात्राओं के नाम घोषित किए और फिर सब भूल गया। उल्लेखनीय है कि निरालानगर निवासी सेवानिवृत्त पुलिस उपाधीक्षक डॉ. रामाश्रय सिंह ने वर्ष 2001 में बेटी की मृत्यु के बाद उसके नाम पर छात्रवृत्ति शुरू करने का प्रयास किया। यह छात्रवृत्ति लविवि और उससे जुड़े कॉलेजों में समाजशास्त्र की दो मेधावी छात्राओं को दी जानी थी। उन्होंने साठ हजार रुपये भी दिसम्बर 2001 में लखनऊ विवि को दे दिए। दो साल बाद लविवि ने स्व.श्रीमती सुमन सिंह मेमोरियल छात्रवृत्ति को स्वीकृति भी दे दी। उसके बाद से डा. सिंह भटक रहे थे। दैनिक जागरण ने डॉ. सिंह के प्रयास और लविवि अधिकारियों की संवेदनहीनता को 28 सितंबर 2010 के अंक में प्रकाशित किया। 30 सितंबर को ही लविवि ने आठ वर्षो की छात्रवृत्ति के लिए 17 छात्राओं के नाम जारी कर दिए। एक महीने बाद धन का हिसाब भी दे दिया गया। इसके अनुसार 18 जनवरी 2012 को साठ हजार रुपये बढ़कर 1,69,064 रुपये हो जाएगा। छात्रवृत्ति के लिए नाम घोषित किये तीन माह बीत चुके हैं, लेकिन लविवि अधिकारियों ने कोई प्रयास नहीं किया है। छात्राएं इस बाबत जानकारी भी हासिल करने पहुंचीं, लेकिन वे कुलसचिव, समाजशास्त्र विभाग और उपकुलसचिव के चक्कर लगाकर वापस चली गईं। छात्रवृत्ति दीक्षांत समारोह में बांटने की बात कही गई और बाद में अधिकारी इससे मुकर गए। तर्क दिया गया कि दीक्षांत समारोह में छात्रवृत्ति नहीं दी जाती है, बाद में वितरित की जाएगी। दीक्षांत समारोह हुए भी एक माह बीत चुका है और अधिकारियों ने अभी भी सुधि नहीं ली है(दैनिक जागरण,लखनऊ,31.12.2010)।

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