हर रोज दफ्तर के लिए घर से चलते हैं अफसरी ठाट-बाट से। सुबह दस बजे दफ्तर पहुंचते हैं तो बन जाते हैं चपरासी। खोलते हैं एक कोठरीनुमा कार्यालय का ताला। अगले ही क्षण हो जाते हैं स्वीपर। करते हैं कुर्सी-मेज की सफाई, फाइलों से झाड़ते हैं धूल। ..और फिर कुर्सी पर बैठते ही बन गये बाबू, जब करते हैं दस्तखत तो अ जाते हैं साहब के रुआब में यानि अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारी। जीहां! पीसीएस से चुने गए ये वो अधिकारी हैं, जो जिलास्तर पर अल्पसंख्यकों के कल्याण की पांच योजनाएं चलाते हैं। मंडल के चार जिलों में इस विभाग में स्टॉफ के नाम पर ये अधिकारी इकलौते ही हैं। हर रोज मल्टीटास्किंग की उनकी इन कसरतों से अफसरशाही की सारी हसरतों पर ही पानी पड़ गया है। उत्तर प्रदेश में वर्ष 1995 में समाज कल्याण से अल्पसंख्यकों को अलग कर जिला अल्पसंख्यक कल्याण विभाग बनाया गया। इसके अधिकारी की भर्ती लोक सेवा आयोग के माध्यम से की गई। विभाग सृजित करने के साथ-साथ विभाग के सभी पद तय कर दिए गए। इस विभाग का काम अल्पसंख्यकों के कल्याण के लिए चलने वाली योजनाओं का संचालन करना था। अल्पसंख्यक कल्याण विभाग का गठन करने के साथ ही शासन ने अधिकारी तो तैनात कर दिए, लेकिन न तो इनके लिए कार्यालय मिला और न ही स्टॉफ। शुरूआत में विभाग केवल अल्पसंख्यकों की छात्रवृत्ति का काम देखता था, लेकिन बाद में योजनाएं बढ़ती गई। इनके साथ काम भी बढ़ता गया, लेकिन स्टॉफ के नाम पर एक चपरासी भी न मिला। मंडल के चार जिलों में कहीं विकास भवन में एक केबिन दिया गया तो कहीं कलेक्ट्रेट में थोड़ी सी जगह देकर अधिकारी को बिठाया गया। मंडल के आगरा, मथुरा, फीरोजाबाद और मैनपुरी जिलों यह विभाग हर साल 12 करोड़ से अधिक का बजट बांटता है, जिसका पूरा काम इन अधिकारियों के हवाले है(राहुल सिंघई,दैनिक जागरण,आगरा,7.12.2010)।
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