सूबे में उच्च शिक्षा विभाग के अधीन अनुदानित कॉलेजों में रखे गए मानदेय शिक्षक शासन के लिए गले की हड्डी बन गए हैं। महकमे के लिए दोधारी तलवार साबित हो रहे मानदेय शिक्षकों के कारण एक तरफ विभाग मुकदमों की मार झेलने को मजबूर है दूसरी ओर इनकी वजह से उच्चतर शिक्षा सेवा चयन आयोग से चुने गए शिक्षकों की कॉलेजों में नियुक्ति नहीं हो पा रही है।
अनुदानित कॉलेजों के लिए शिक्षकों का चयन उच्चतर शिक्षा सेवा चयन आयोग करता है। कॉलेजों में जितनी बड़ी संख्या में शिक्षकों की जरूरत है, उस तादाद में आयोग शिक्षकों का चयन कर नहीं पाता। शिक्षकों की कमी से निपटने के लिए शासन ने सात अप्रैल 1998 को आदेश जारी किया था। इस शासनादेश के मुताबिक यदि अभ्यर्थी विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा तय अर्हता को पूरी करता है तो कॉलेज प्रबंधन निर्धारित प्रक्रिया का पालन करते हुए उसे बतौर मानदेय शिक्षक नियुक्त कर सकता है। इस नियुक्ति के लिए निदेशक उच्च शिक्षा की मंजूरी जरूरी है। शासनादेश में मानदेय शिक्षकों की नियुक्ति एक शैक्षिक सत्र के लिए करने का प्रावधान है। व्यवस्था है कि जब आयोग से चयनित अभ्यर्थी कॉलेज में ज्वाइन करने आयेगा तो मानदेय शिक्षक की सेवा समाप्त हो जाएगी।
आयोग की लचर कार्यशैली के चलते वर्षों तक नियमित शिक्षकों का चयन लंबित रहता है और मानदेय शिक्षक कॉलेजों में जमे रहते हैं। कई वर्षों तक पढ़ाने के बाद वे अपनी सेवा के विनियमितीकरण के लिए अदालत की शरण में चले जाते हैं। वहीं जब आयोग से चयनित शिक्षक कालेज में पहुंचते हैं तो मानदेय शिक्षकों की मौजूदगी का हवाला देते हुए प्रबंधतंत्र उन्हें ज्वाइन कराने में असमर्थता जताते हैं। इस पर चयनित शिक्षक भी नौकरी का हक पाने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाते हैं।
इस समस्या से निपटने के लिए शासन अब समस्या की जड़ यानी सात अप्रैल 1998 के शासनादेश को निरस्त कर नई व्यवस्था लागू करने की सोच रहा है। नई व्यवस्था के संबंध में निदेशक उच्च शिक्षा ने शासन को प्रस्ताव भेजा है। प्रस्ताव में विश्वविद्यालयों और कालेजों के सेवानिवृत्त शिक्षकों को एक निश्चित मानदेय पर 70 वर्ष की उम्र तक अध्यापन का मौका दिये जाने की बात कही गई है। इस दौरान उन्हें पेंशन मिलती रहेगी। सेवानिवृत्त शिक्षकों को मौका दिये जाने के बारे में इसलिए सोचा जा रहा है क्योंकि विभाग को उनकी ओर से मुकदमेबाजी का अंदेशा नहीं है(राजीव दीक्षित,दैनिक जागरण,लखनऊ,19.12.2010)।
नमस्कार साहब,
जवाब देंहटाएंआप नाम तो शिक्षा मित्र लिख रहे हैं पर मित्रवत दीखते नहीं हैं. ऐसा लग रहा है कि आप सरकार के नुमाइंदे के रूप में मानदेय वालों के विरुद्ध बोल रहे हैं.
आप एक भी ऐसा उदाहरण बताएं जब कि आयोग ने सभी रिक्त स्थानों को भर दिया हो. आयोग अपनी नाकामी को मंदी वालों के ऊपर निकल रहा है. आप भी सरकारी भाषा बोल रहे हैं.
आपको सकारात्मक उदाहरण दिखाएँ.......
उरई शहर के गाँधी महाविद्यालय में पिछले १७ वर्ष से अंग्रेजी में कोई भी शिक्षक नहीं है, बताएं कि क्या पिछले १७ वर्ष में आयोग ने किसी अंग्रेजी शिक्षक को नियुक्त नहीं किया. इसी महाविद्यालय में लगभग १२ वर्ष से राजनीति विज्ञान में कोई नहीं है, क्या आयोग ने इस विषय में भी कोई नियुक्ति नहीं की है?
आगे आपको बताते चलें कि बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय झाँसी से सम्बद्ध महाविद्यालयों में सिर्फ हिंदी, बी० एड० में नियुक्ति पिछले कुछ वर्षों में हुईं हैं, अंग्रेजी में पिछले १७ सालों से, इतिहास में पिछले १७ सालों से, राजनीति विज्ञान में पिछले २१ सालों से, वनस्पति विज्ञान, अर्थशास्त्र, संस्कृत, जन्तुविज्ञान, समाज शास्त्र आदि ऐसे विषय हैं जिनमे पिछले २०-२१ सालों से कोई नियुक्ति आयोग नहीं कर पाया. (दयानंद महाविद्यालय, उरई के सन्दर्भ में)
अब यदि आयोग इन जगहों पर नियुक्ति कर रहा है तो देखना चाहिए वो भी तब कर रहा है जब यहाँ मानदेय पर कोई युवक-युवती पढ़ाने लगा है. ये सरकार का ड्रामा है. जहाँ तक महाविद्यालयों में शिक्षकों की आयु को ६० से ६२ कर देना और अब ६२ को ६५ में बदलने को आप क्या कहेंगे? क्या ये नीतिगत रूप से सही है. वैसे भी ५५ के बाद आदमी की क्षमता कम होने लगती है यहाँ सरकार अपना खजाना क्षमता कम करके शिक्षकों को लगातार ढ़ोती जा रही है.
आप अपनी आँखें खोलिए और यदि विस्तार में कुछ जानना चाहे तो मेल करियेगा.
नमस्कार साहब,
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आप एक भी ऐसा उदाहरण बताएं जब कि आयोग ने सभी रिक्त स्थानों को भर दिया हो. आयोग अपनी नाकामी को मंदी वालों के ऊपर निकल रहा है. आप भी सरकारी भाषा बोल रहे हैं.
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उरई शहर के गाँधी महाविद्यालय में पिछले १७ वर्ष से अंग्रेजी में कोई भी शिक्षक नहीं है, बताएं कि क्या पिछले १७ वर्ष में आयोग ने किसी अंग्रेजी शिक्षक को नियुक्त नहीं किया. इसी महाविद्यालय में लगभग १२ वर्ष से राजनीति विज्ञान में कोई नहीं है, क्या आयोग ने इस विषय में भी कोई नियुक्ति नहीं की है?
आगे आपको बताते चलें कि बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय झाँसी से सम्बद्ध महाविद्यालयों में सिर्फ हिंदी, बी० एड० में नियुक्ति पिछले कुछ वर्षों में हुईं हैं, अंग्रेजी में पिछले १७ सालों से, इतिहास में पिछले १७ सालों से, राजनीति विज्ञान में पिछले २१ सालों से, वनस्पति विज्ञान, अर्थशास्त्र, संस्कृत, जन्तुविज्ञान, समाज शास्त्र आदि ऐसे विषय हैं जिनमे पिछले २०-२१ सालों से कोई नियुक्ति आयोग नहीं कर पाया. (दयानंद महाविद्यालय, उरई के सन्दर्भ में)
अब यदि आयोग इन जगहों पर नियुक्ति कर रहा है तो देखना चाहिए वो भी तब कर रहा है जब यहाँ मानदेय पर कोई युवक-युवती पढ़ाने लगा है. ये सरकार का ड्रामा है. जहाँ तक महाविद्यालयों में शिक्षकों की आयु को ६० से ६२ कर देना और अब ६२ को ६५ में बदलने को आप क्या कहेंगे? क्या ये नीतिगत रूप से सही है. वैसे भी ५५ के बाद आदमी की क्षमता कम होने लगती है यहाँ सरकार अपना खजाना क्षमता कम करके शिक्षकों को लगातार ढ़ोती जा रही है.
आप अपनी आँखें खोलिए और यदि विस्तार में कुछ जानना चाहे तो मेल करियेगा.
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आप एक भी ऐसा उदाहरण बताएं जब कि आयोग ने सभी रिक्त स्थानों को भर दिया हो. आयोग अपनी नाकामी को मंदी वालों के ऊपर निकल रहा है. आप भी सरकारी भाषा बोल रहे हैं.
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उरई शहर के गाँधी महाविद्यालय में पिछले १७ वर्ष से अंग्रेजी में कोई भी शिक्षक नहीं है, बताएं कि क्या पिछले १७ वर्ष में आयोग ने किसी अंग्रेजी शिक्षक को नियुक्त नहीं किया. इसी महाविद्यालय में लगभग १२ वर्ष से राजनीति विज्ञान में कोई नहीं है, क्या आयोग ने इस विषय में भी कोई नियुक्ति नहीं की है?
आगे आपको बताते चलें कि बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय झाँसी से सम्बद्ध महाविद्यालयों में सिर्फ हिंदी, बी० एड० में नियुक्ति पिछले कुछ वर्षों में हुईं हैं, अंग्रेजी में पिछले १७ सालों से, इतिहास में पिछले १७ सालों से, राजनीति विज्ञान में पिछले २१ सालों से, वनस्पति विज्ञान, अर्थशास्त्र, संस्कृत, जन्तुविज्ञान, समाज शास्त्र आदि ऐसे विषय हैं जिनमे पिछले २०-२१ सालों से कोई नियुक्ति आयोग नहीं कर पाया. (दयानंद महाविद्यालय, उरई के सन्दर्भ में)
अब यदि आयोग इन जगहों पर नियुक्ति कर रहा है तो देखना चाहिए वो भी तब कर रहा है जब यहाँ मानदेय पर कोई युवक-युवती पढ़ाने लगा है. ये सरकार का ड्रामा है. जहाँ तक महाविद्यालयों में शिक्षकों की आयु को ६० से ६२ कर देना और अब ६२ को ६५ में बदलने को आप क्या कहेंगे? क्या ये नीतिगत रूप से सही है. वैसे भी ५५ के बाद आदमी की क्षमता कम होने लगती है यहाँ सरकार अपना खजाना क्षमता कम करके शिक्षकों को लगातार ढ़ोती जा रही है.
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