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31 दिसंबर 2010

भारत का संस्कार है नागरी लिपि

साहित्य अकादमी में "नागरी लिपि और भारतीय भाषाएं" पर परिसंवाद आयोजित किया गया। इसमें उद्घाटन भाषण देते हुए भाषाविद् लोकेशचन्द्र ने कहा कि भारत में सबसे दुखद पहलू यह है कि हिन्दी के साथ अब देवनागरी लिपि का प्रयोग कम हो रहा है। इसकी जगह रोमन लिपि ले रहा है। उन्होंने कहा कि नागरी लिपि भारत का संस्कार है। लेकिन सिर्फ यही लिपि रहे, अन्य नहीं। ऐसी हठधर्मिता नहीं होनी चाहिए। भाषाविद् रामनिरंजन परिमलेन्दु ने जहां इसके ऐतिहासिक विकास पर प्रकाश डाला, वहीं वी. शुक्ल ने नागरी लिपि का इस्तेमाल सिंधी, कश्मीरी जैसी भाषाओं में होने की बात कही। डॉ. रविटेक चन्दानी ने सिंधी भाषा के लिए देवनागरी लिपि को बेहतर बताया और कहा कि अन्य लिपियों में प्रचलित सिन्धी भाषा पाठकों और लोगों के बीच भ्रम पैदा करता है। माधवेन्द्र पांडेय ने नागरी लिपि और हिन्दी के संदर्भ में उत्तर पूर्व की मानसिकता और कठिनाईयों पर चर्चा की। सूचना प्रौद्योगिकी के संदर्भ में भाषाविद् लीना मेहेंदेले ने कहा कि भारत में भाषाओं की लिपि अलग अलग है पर वर्णमाला एक है। यह एकात्मकता का परिचय है। परिसंवाद में दामोदर मावजो, शशिशेखर तोषखाना, बीबी कुमार, माधवेन्द्र पांडेय, अशोक चक्रधर, ओमविकास और विजय कुमार मल्होत्रा जैसे कई भाषाविदें ने हिस्सा लिया और अपने अपने विचार रखे। वक्ताओं का स्वागत अकादमी के उपसचिव ब्रजेन्द्र त्रिपाठी ने किया(नई दुनिया,दिल्ली,31.12.2010)।

1 टिप्पणी:

  1. लिपि पर मेरी पोस्‍ट 'अक्षर छत्‍तीसगढ़' akaltara.blogspot.com पर है, देखना चाहेंगे.

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