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07 दिसंबर 2010

मध्यप्रदेशःस्कूलों को बंद रखने का औचित्य क्या?

"मध्यप्रदेश में शिक्षा के क्षेत्र में पहले की तुलना में बेहतर कार्य हुआ है, इस क्षेत्र में अभी बहुत सुधार की जरूरत है।"मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अपने कार्यकाल के पांच वर्ष पूर्ण होने पर जब मीडिया के लिए उक्त आशय के बयान दे रहे थे,लगभग उसी समय भोपाल के एक दर्जन से अधिक स्कूलों को 29 नवम्बर के दिन बंद रखने का निर्णय शिक्षा विभाग के अधिकारियों ने लिया। राज्य में सत्तारूढ़ भाजपा की ओर से मुख्यमंत्री श्री सिंह के कार्यकाल की 5 वर्ष की अवधि पूरी हो जाने पर 29 नवम्बर को गौरव दिवस के रूप में मनाने का आह्वान किया गया। इस आह्वान मे प्रदेश भर के कार्यकर्ताओं से भोपाल आने के लिए कहा गया जहां भाजपा के दिग्गजों ने भव्य समारोह में मुख्यमंत्री श्री सिंह का सम्मान किया।

भाजपा के आह्वान पर आयोजित गौरव दिवस से किसी को क्या आपत्ति हो सकती है लेकिन इसके नाम पर एक दिन कुछ स्कूलों को बंद कर देने की घोषणा कहां तक उचित है? भोपाल के भेल इलाके में एक दर्जन स्कूलों में 29 नवम्बर को तालाबंदी हो जाने से बच्चों की पढ़ाई का नुकसान हुआ। राज्य शिक्षा केन्द्र ने भी भेल क्षेत्र के कुछ स्कूलों में इस दिन होने वाली छमाही परीक्षा भी स्थगित कर अगले दिन आयोजित करने के निर्देश दिये गये। एक ओर जहां मध्यप्रदेश में शिक्षा की गुणवत्ता को बढ़ाने के लिए नई नई योजनाओं के क्रियान्वयन का दावा हो रहा है, शिक्षा के अधिकार को त्वरित गति से लागू किये जाने की चर्चा हो रही है, वहीं राजनीतिक आयोजन के चक्कर में बच्चों की पढ़ाई को कुर्बान किया जा रहा हैं। इसके पहले मध्यप्रदेश के ही टीकमगढ़ जिले के एक गांव में सत्तारूढ़ दल के नेताजी की रैली को सफल बनाने के लिए जनपद पंचायत के अधिकारी ने मध्यान्ह भोजन के बजट का उपयोग करने के लिखित निर्देश दे डाले थे। जब इसका हल्ला मचा तो मामले को रफा दफा कर दिया गया। 

यहां यह पूछना प्रासंगिक है कि राजनीतिक आयोजन के कारण बच्चों की पढ़ाई प्रभावित नहीं हो, क्या ऐसी कोई व्यवस्था साकार हो सकेगी? मध्यप्रदेश में शिक्षा को लेकर जो आंकड़े पेश किए जा रहे हैं, जो सुनहरी तस्वीर दिखाई जा रही है, हकीकत में ऐसा नहीं है। अब भी प्रदेश में स्कूल जाने योग्य उम्र के एक लाख अस्सी हजार से ज्यादा बच्चे शिक्षा से दूर हैं। ग्रामीण इलाकों के स्कूलों में पीने के पानी, शौचालय, शैक्षणिक सामग्री का अभाव है। मध्यान्ह भोजन और शिक्षक विद्यार्थी अनुपात में गड़बड़ी होने के साथ ही अन्य कई समस्याएं भी हैं। जिनका समाधाननहीं हो पाया है। उल्लेखनीय है कि शिक्षा का सर्वव्यापी और सर्वस्पर्शी होना राच्य एवं राजनीतिक दलों की प्राथमिकता में होना चाहिए। परंतु नेताओं के वादे अक्सर घोषणा पत्रों में ही सिमटकर रह जाते हैं। शिक्षा का मूलत: बच्चों से जुड़ा मामला है और बच्चे वोट नहीं देते। जो वोट नहीं देते उनकी चिंता करना नेताओं के लिए शायद जरूरी नहीं है। 

हमें मानना होगा कि राजनीतिक दल चाहे कोई भी हो सभी ने बच्चों और उनकी शिक्षा के प्रति पर्याप्त ध्यान नहीं दिया है। हम यह भी देखते हैं कि साल दर साल बजट की राशि बढ़ती चली जाती है लेकिन बच्चों के प्रति नेताओं की उपेक्षा के भाव में कोई परिवर्तन नहीं दिखता। ऐसा लगता है कि बच्चों को उनके हाल पर छोड़ दिया गया है और अधिकारी हो या नेता सब अपने स्वार्थ की चिंता में लगे हैं। चूंकि असरदार नेताओं, अधिकारियों, उद्योगपतियों और संपन्न वर्ग के लोगों के बच्चे शानदार निजी स्कूलों में महंगी फीस देकर पढ़ते हैं इसलिए सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों की पढ़ाई राम भरोसे ही चलती है। जब तक सभी स्कूलों में समान शिक्षा प्रणाली लागू न हो और शिक्षा के अधिकार को पूरी गंभीरता के साथ लागू न किया जाए तब तक बच्चों की शिक्षा से नेता हो या अधिकारी खिलवाड़ करते ही रहेंगे(संपादकीय,दैनिक जागरण,भोपाल,7.12.2010)।

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