दुनिया भर में बढ़ता पॉल्यूशन रोकने, ग्रीन हाउस इफेक्ट्स के जलवायु और मौसम पर पड़ने वाले कुप्रभावों पर नियंत्रण तथा मानव समुदाय पर होने वाले असर की रोकथाम के लिए विश्वव्यापी तौर पर सभी देश मिलकर कदम उठा रहे हैं। इनमें कार्बन उत्सर्जन में कमी की अवधारणा का महत्वपूर्ण स्थान है। कार्बन-डाइ-ऑक्साइड को वातावरण प्रदूषित करने वाली सर्वाधिक अहम गैस के रूप में देखा जाता है। लेकिन यह जानकर आश्चर्य होना स्वाभाविक है कि अब कार्बन-डाइ-ऑक्साइड के माध्यम से लोगों, कंपनियों तथा देशों के लिए मोटी कमाई कर पाना संभव हो गया है। कार्बन क्रेडिट की ट्रेडिंग अब एक प्रोफेशन का रूप ले चुकी है।
पढ़ने-सुनने में यह निस्संदेह अजीब सा प्रतीत होता है पर हाल के वर्षों में कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग का प्रचार-प्रसार काफी व्यापक तौर पर हुआ है और बाकायदा राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस प्रकार के एक्सचेंज भी कार्यरत हैं। इनका संचालन विभिन्न देशों की सरकारें अथवा शीर्ष स्तर की अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां करती हैं। इसकी शुरुआत युनाइटेड नेशंस फ्रेमवर्क कॉनवेंशन और क्लाइमेट चेंज (यूएनएफ सीसीसी) द्वारा विभिन्न परियोजनाओं में क्लीन डेवलपमेंट मेकेनिज्म (सीडीएम) को अपनाने के प्रस्ताव को पारित करने से हुई। विभिन्न कंपनियों अथवा राष्ट्रों को कार्बन उत्सर्जन के प्रति हतोत्साहित करना ही इसका मूल उद्देश्य रखा गया था। इनके प्रावधानों में दुनिया भर के समूचे कार्बन उत्सर्जन की एक तयशुदा सीमा निर्धारित करना और मार्केट में प्रति कार्बन क्रेडिट पॉइंट की मॉनेटरी वेल्यू का निर्धारण करना आदि मुख्य हैं। इस प्रकार प्रत्येक राष्ट्र और इंडस्ट्री अपने तय कोटे में बचे कार्बन क्रेडिट के अंकों को बेचकर अतिरिक्त धन कमा सकता है। वहीं दूसरी ओर ज्यादा कार्बन उत्सर्जन करनेवालों को मज़बूरी में कीमत चुका कर इन कार्बन पॉइंट्स को हासिल करना पड़ता है। इसका ज्यादा फायदा विकासशील राष्ट्र्रों को मिल रहा है क्योंकि विकसित (यूएसए, आस्ट्रेलिया आदि ) राष्ट्र अपने औद्योगिक उत्पादन के क्रम में कार्बन-डाइ-ऑक्साइड का उत्सर्जन तयशुदा से कहीं अधिक मात्रा में करते हैं। ऐसे में उनके पास विकासशील देशों से ये क्रेडिट खरीदने के अलावा कोई चारा नहीं बचता है। कमोबेश यही स्थिति भारी और प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों एवं अन्य अपेक्षाकृत कम प्रदूषणकारी उद्योगों के बीच देखी जा सकती है। अंतरराष्ट्रीय बाजार के कार्बन एक्सचेंज में इन कार्बन पॉइंट्स का मूल्य २५ डॉलर से लेकर १५० अमेरिकी डॉलर तक हो सकता है।
एक अनुमान के अनुसार फिलहाल कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग का कारोबार लगभग २ हजार करोड़ रुपए से अधिक है तथा आने वाले समय में इसमें अत्यंत तेजी से वृद्धि होने की संभावना व्यक्त की जा रही है। जाहिर है, इस प्रकार के कारोबार एवं सौदों के लिए ट्रेडर्स, एजेंट्स और कमिशन एजेंट्स की जरूरत पड़ने लगी है। इतना ही नहीं, बतौर कंसल्टेंट भी बड़ी कंपनियों या अंतरराष्ट्रीय संगठनों से जुड़ा जा सकता है।
कई निजी और विदेशी संस्थानों में कार्बन मैनेजमेंट आधारित कोर्सज का आयोजन शुरू हो चुका है। इन कोर्सज में अमूमन इंजीनियरिंग, इकॉनोमिक्स या रिन्यूबल एनर्जी सरीखे विषयों में ग्रेजुएट युवाओं को प्राथमिकता दी जाती है। ये कोर्स एक सेदो वर्षीय अवधि के हो सकते हैं। आने वाले समय में एमबीए की तरह का फुल डिग्री कोर्स भी किसी सरकारी संस्थान से शुरू हो जाए तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। इसमें कोई दो राय नहीं कि यह अत्यंत तेजी से उभरता क्षेत्र है तथा आने वाले वर्षों में बड़ी संख्या में इस प्रकार के प्रोफेशनल्स की जरूरत पड़ेगी। भारत जैसे देश में इस व्यवसाय में ट्रेंड लोगों की अपेक्षाकृत ज्यादा मांग इसलिए भी संभावित है कि पर्यावरण हितैषी प्रॉजेक्ट्स को ही सरकार द्वारा मंजूरी दी जा रही है। इन प्रॉजेक्ट्स में कार्बन क्रेडिट के जानकारों की जरूरत से इनकार नहीं किया जा सकता है(अशोक सिंह,मेट्रो रंग,नई दुनिया,दिल्ली,6.12.2010)।
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