संदिग्ध आतंकवादियों और दूसरे खतरनाक अभियुक्तों की पैरवी करने से वकीलों की रोकने की बढ़ती प्रवृत्ति से चिंतित सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि वकील या उनके संगठन किसी आतंकवादी, बलात्कारी, हत्यारे या दूसरे अपराधों में लिप्त अभियुक्तों की पैरवी से इनकार नहीं कर सकते हैं। न्यायालय ने कहा कि वकीलों या उनके संगठनों द्वारा अभियुक्तों की पैरवी से इनकार करने से संविधान के प्रावधानों और बार काउंसिल के नियमों का हनन होता है। न्यायमूर्ति मार्कंडेय काटजू और न्यायमूर्ति ज्ञान सुधा मिश्रा की खंडपीठ ने मंगलवार को ए. एस. मोहम्मद रफी की याचिका पर सुनाए गए फैसले में बार एसोसिएशनों द्वारा किसी वारदात विशेष के अभियुक्तों की पैरवी नहीं करने के बारे में प्रस्ताव पारित करने की बढ़ती प्रवृत्ति की तीखी आलोचना की है। न्यायाधीशों ने कहा है कि इस तरह प्रस्ताव पूरी तरह गैर कानूनी है और यह वकालत के पारंपरिक सिद्घांतों के अनुरूप भी नहीं है। अभियुक्त की पैरवी से वकीलों को रोकना संविधान प्रदत्त अधिकारों के भी खिलाफ है। न्यायाधीशों ने कहा कि यदि कोई मुवक्किल किसी वकील की सेवाएं लेना चाहता है और इसके लिए वह वाजिब मेहनताना देने के लिए तैयार हो तो वकीलों को ऐसा मुकदमा हाथ में लेने से इंकार नहीं करना चाहिए। वकालत के पेशे में नैतिकता का तकाजा भी यही है। न्यायालय ने कोयंबटूर में मोहम्मद रफी के खिलाफ १५ दिसम्बर २००६ को दर्ज प्राथमिकी निरस्त करने के साथ ही उसे बतौर मुआवजा डेढ़ लाख रूपए का भुगतान करने का आदेश भी तमिलनाडु की सरकार को दिया है। न्यायालय ने इस फैसले की प्रति सभी हाईकोर्ट बार एसोसिएशन और राज्य बार काउंसिल के पास भेजने का आदेश रजिस्ट्री को दिया है(नई दुनिया,दिल्ली,8.12.2010)।
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