सुप्रीमकोर्ट ने सशस्त्र बल न्यायाधिकरण द्वारा एक महिला सैन्य अधिकारी के स्थायी कमीशन पर विचार करने के निर्देश देने को चुनौती देने वाली केंद्र की याचिका को सोमवार को खारिज कर दिया। न्यायमूर्ति जेएम पांचाल और न्यायमूर्ति एसएस निज्जर की पीठ ने न्यायाधिकरण के 10 नवंबर के फैसले में हस्तक्षेप करने से इंकार करते हुए सरकार से कहा कि मेजर लीना गुरव की मेजर से लेफ्टिनेंट कर्नल के रूप में पदोन्नति के लिए स्थायी कमीशन का दर्जा देने संबंधी याचिका पर विचार किया जाए। सॉलिसिटर जनरल गोपाल सुब्रमण्यम ने न्यायाधिकरण के आदेश का इस आधार पर विरोध किया था कि शीर्ष न्यायालय ने 2 अगस्त 2010 को अपने फैसले में कहा था कि महिला अधिकारी को स्थायी कमीशन दिया जाए बशर्ते वह विभागीय परीक्षा में उत्तीर्ण हों। उन्होंने कहा कि शीर्ष न्यायालय के निर्देश के बावजूद न्यायाधिकरण ने 10 नवंबर को सरकार से लीना के स्थायी कमीशन पर विचार करने को कहा जबकि उन्होंने परीक्षा में बैठने से इंकार कर दिया था। हालांकि लीना की वकील रेखा पल्ली ने इस दलील का विरोध करते हुए कहा कि लीना को परीक्षा में बैठने की जरूरत नहीं है क्योंकि वह पहले ही 14 साल तक सेवा में रह चुकी हैं और अपनी पदोन्नति परीक्षा उत्तीर्ण कर चुकी हैं। उन्होंने कहा कि परीक्षा देने की जरूरत उन्हें होती है जो केवल तीन से चार साल सेवा में रहे हों। पीठ ने दलीलों को सुनने के बाद केंद्र की याचिका खारिज कर दी। लीना फिलहाल लखनऊ में सेना की जज एडवोकेट जनरल (जेएजी) विंग में सेवारत हैं। 2 अगस्त को महिला सैन्य अधिकारी अपनी कानूनी लड़ाई के पहले दौर में जीत गईं थी जब सरकार ने सुप्रीमकोर्ट को आश्वासन दिया था कि वह उन्हें कानूनी और शैक्षणिक शाखाओं में स्थायी कमीशन देने पर विचार करेगी। सरकार ने कहा था कि शार्ट सर्विस कमीशन की सेवारत अधिकारियों को दो महीने के भीतर सेना की जेएजी और शैक्षणिक शाखाओं में स्थायी कमीशन पर विचार किया जाएगा। शीर्ष न्यायालय ने सरकार से एक अतिरिक्त हलफनामा दाखिल करने को कहा था, जिसमें स्थायी कमीशन प्राप्त करने वाली अधिकारियों को दी गई जिम्मेदारी की प्रकृति विस्तार से बताई गई हो। रक्षा मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक कुल 2200 महिला अधिकारी हैं, जिनमें 1200 थलसेना में, 750 वायु सेना में और 250 नौसेना में हैं(दैनिक जागरण,राष्ट्रीय संस्करण,7.12.2010)।
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