रांची के रामलखन सिंह यादव कॉलेज में साइंस की पढ़ाई के नाम पर किस कदर मजाक होता है, इसका अंदाजा बॉटनी प्रयोगशाला की हालत को देखकर लगाया जा सकता है। भास्कर टीम जब यहां पहुंची तो भीतर सब कुछ अस्त-व्यस्त था, मेज पर धूल जमी थी।
केमिकल की कुछ बोतलें खाली तो कुछ खराब हो चुके तरल से भरी थीं। जूलॉजी की प्रयोगशाला भी कुछ ऐसी ही थी। अब प्रश्न यह उठता है कि जब प्रायोगिक कक्षाएं ही नहीं होती हैं, तो विद्यार्थी इसमें उत्तीर्ण कैसे हो जाते हैं।
टेंट में पढ़ते हैं विद्यार्थी
कॉलेज में कुछ कक्षाएं भवन के अभाव में टेंट में चलती हैं। शिक्षक बताते हैं कि इस टेंट में इंटर से लेकर स्नातक तक की सामान्य कक्षाएं चलती हैं। कॉलेज के आठ हजार में से तीन हजार विद्यार्थी इंटर से लेकर स्नातक साइंस तक के हैं। इन्हें प्रयोग के लिए मूलभूत सुविधाएं मुहैया कराना कॉलेज और विवि प्रशासन की जिम्मेवारी है। इस पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है। इतना ही नहीं कॉलेज में पेयजल की व्यवस्था नहीं रहने से शिक्षकों और छात्रों को परेशानी होती है।
विवि प्रशासन टीम गठित कर जनवरी से कॉलेजों का निरीक्षण करेगा। आधारभूत संरचना ठीक की जाएगी। प्रैक्टिकल नहीं होने पर कॉलेजों के प्राचार्य जिम्मेवार होंगे।
डॉ. एए खान, वीसी, रांची विवि
सुविधाओं के अभाव के बावजूद कॉलेज में प्रैक्टिकल होते हैं। समस्याओं की मुख्य वजह कॉलेज भूमि को लेकर विवाद है।
डॉ. मेधावती आर्या, प्राचार्य(दैनिक भास्कर,रांची,22.12.2010)
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