अब संघ लोकसेवा आयोग (यज्पीएससी) नियमों और गोपनीयता की दुहाई देकर अभ्यर्थियों को अंक दिखाने से नहीं बच सकता। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि अंक दिखाए जाने का दिल्ली हाईकोर्ट का तीन सितंबर 2008 का आदेश फिलहाल लागज् है। कोर्ट ने यह आदेश 15 छात्रों की याचिका पर सुनवाई करते हुए जारी किया। अब यज्पीएससी को सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल करने वाले 15 अभ्यर्थियों को 2010 की सिविल सेवा की प्रारंभिक परीक्षा के अंक बताने होंगे। कोर्ट द्वारा स्थिति साफ कर दिए जाने के बाद यज्पीएससी को 2007 में दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दाखिल करने वाले अभ्यर्थियों को भी अंक बताने पड़ेंगे। वह सुप्रीम कोर्ट में मामला लंबित रहने की आड़ नहीं ले सकता। सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करने वाले 15 अभ्यर्थियों ने आरोप लगाया था कि गत 23 मई को हुई सिविल सेवा की प्रारंभिक परीक्षा में उनके साथ नाइंसाफी हुई है। उनसे नीची मेरिट वाले मुख्य परीक्षा के लिए चयनित हो गए, जबकि वे रह गए। इन अभ्यर्थियों ने दिल्ली हाईकोर्ट के तीन सितंबर 2008 के आदेश को आधार बनाया था, जिसमें यज्पीएससी को अंक दिखाने का आदेश दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि दिल्ली हाईकोर्ट का वह आदेश अभी भी लागज् है, क्योंकि उस आदेश को चुनौती देने वाली यज्पीएससी की याचिका परीक्षा नियमों में बदलाव किए जाने के कारण सुप्रीम कोर्ट से खारिज हो चुकी है।
कैसे साफ हुई स्थिति :
17 अप्रैल 2007 को दिल्ली हाईकोर्ट की एकल पीठ ने यज्पीएससी को सिविल सेवा परीक्षा के अंक दिखाने का निर्देश दिया था। यज्पीएससी ने फैसले को हाईकोर्ट की खंडपीठ में चुनौती दी और हाईकोर्ट की खंडपीठ ने 3 सितंबर 2008 को एकल पीठ के फैसले पर मुहर लगा दी। खंडपीठ ने यज्पीएससी का निर्देश दिया कि वह याचिकाकर्ता अभ्यर्थियों के जनरल स्टडीज और विषयानुसार कट ऑफ अंकों का खुलासा करे। साथ ही माडल उत्तर भी दिखाये। यूपीएससी ने हाईकोर्ट के इस आदेश को सुप्रीमकोर्ट में चुनौती दी थी और सुप्रीमकोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी थी।(दैनिक जागरण,दिल्ली,22.12.2010)।
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