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31 दिसंबर 2010

इंजीनियरिंग कॉलेजों में बढ़ेगी दो लाख सीटें,कंपनियां भी देंगी उच्च शिक्षा

मानव संसाधन विकास मंत्रालय नए साल में तकनीकी कॉलेजों में प्रवेश लेने वाले छात्रों को एक नया तोहफा देने जा रहा है। केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल ने देश में इंजीनियरिंग की तकरीबन 2 लाख सीटें बढ़ाने का एलान किया है। वहीं, ऑल इंडिया काउंसिल फॉर टेक्निकल एजुकेशन के नियमों में संशोधन करते हुए मैनेजमेंट कोर्सेस में 80 हजार और आर्किटेक्चर कोर्स में 2200 सीटें बढ़ाने की भी घोषणा की गई है। उन्होंने यहां एआईसीटीई के संशोधित नियम को जारी करते हुए कहा कि अब से संस्थान प्रति कार्यक्रम में 40 से 60 सीटें बढ़ा सकते हैं।

कॉरपोरेट क्षेत्र भी ख्रोल सकेंगे तकनीकी संस्थान :
कॉरपोरेट क्षेत्र के लिए दरवाजे खोलते हुए उन्होंने कहा कि कंपनियां अब तकनीकी संस्थान खोल सकती हैं बशर्ते उन्हें ऐसे संस्थानों को चलाने के लिए ऐसे संस्थानों को कंपनी कानून की धारा 25 के तहत गैर-लाभकारी संस्था के रूप में पंजीकृत करना पड़ेगा। सिब्बल ने कहा कि इसमें हालांकि संयुक्त उपक्रम शामिल नहीं होंगे तथा इस योजना की केवल उन 241 जिलों में ही अनुमति होगी जहां वर्तमान में एआईसीटीई मान्य संस्थान नहीं हैं।

अब छोटे भूखंडों पर भी कॉलेज:
इंजीनियरिंग कॉलेज स्थापित करने के लिए जमीन के नियमों में भी संशोधन कर उन्हें उदार बनाया है। अब, इंजीनियरिंग कॉलेज पहले के मुकाबले छोटे भूखंड पर भी खोले जा सकेंगे। ग्रामीण इलाकों में खुलने वाले इंजीनियरिंग कॉलेज खोलने के लिए 10 एकड़ जमीन जरूरी होगी, जबकि शहरी क्षेत्रों में इन्हें 2.5 एकड़ जमीन पर खोला जा सकेगा(दैनिक भास्कर,दिल्ली,31.12.2010)।

दैनिक जागरण की रिपोर्टः
अब कंपनियां भी इंजीनियरिंग, मैनेजमेंट और आर्किटेक्चर जैसे उच्च तकनीकी शिक्षण संस्थानों को चलाएंगी। सरकार ने कारपोरेट जगत के लिए इसका रास्ता साफ कर दिया है। शहरी क्षेत्रों में तकनीकी शिक्षण संस्थानों को खोलने के लिए जमीन के मानक बदल दिए गए हैं। इसके साथ ही अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (एआइसीटीई) ने एक बड़ा फैसला किया है, जिससे इंजीनियरिंग में लगभग दो लाख और प्रबंधन (मैनेजमेंट) में लगभग 80 हजार सीटें बढ़ सकती हैं। मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल ने गुरुवार को यहां पत्रकारों से कहा कि उच्च शिक्षा के क्षेत्र में सुधारों और विस्तार के लिए यह एक अहम और जरूरी कदम है। उन्होंने कहा कि कंपनी कानून 1965 की धारा-25 के तहत मुनाफा न कमाने वाली कंपनी के रूप में रजिस्टर्ड कोई भी कंपनी अब तकनीकी शिक्षण संस्थान चलाने के लिए सक्षम होंगी। जरूरतों व भविष्य की चुनौतियों के मद्देनजर ही शहरी क्षेत्रों में तकनीकी शिक्षण संस्थानों के लिए अब 3.5 एकड़ जमीन की बाध्यता नहीं रहेगी। उसे बदल कर 2.5 एकड़ कर दिया गया है। इतना ही नहीं, अब कोई भी तकनीकी शिक्षण संस्थान पर्याप्त संसाधनों के साथ बहुमंजिली इमारत बनाकर एक ही परिसर में दूसरा तकनीकी शिक्षण संस्थान चला सकेगा। ग्रामीण क्षेत्रों के लिए दस एकड़ जमीन की बाध्यता अभी भी रहेगी। इन दोनों के अलावा कोई तीसरी श्रेणी नहीं होगी। अभी ट्रस्ट बनाकर तकनीकी शिक्षण संस्थानों को चलाने का प्रावधान है। कंपनी बनाकर कारपोरेट जगत के लिए यह रास्ता खोलने के बाद भी वह विकल्प बरकरार रहेगा। सिब्बल का कहना है कि कंपनियों के आगे आने से उच्च शिक्षा में पारदर्शिता बढ़ेगी और प्रशासन ज्यादा सुदृढ़ होगा। ट्रस्ट व कंपनियों के प्रावधान में फर्क के बारे में सूत्रों का कहना है, ट्रस्ट की आडिटिंग जरूरी नहीं है, जबकि कंपनी के लिए अकाउंट का आडिट जरूरी है। कंपनी संचालन का भी एक निश्चित तौर-तरीका व जवाबदेही होती है। ट्रस्ट के खत्म होने पर उसकी संपत्तियों को सरकार जब्त कर सकती है, जबकि कंपनी के खात्मे के बाद उसकी संपत्ति शेयरधारकों में बांटी जा सकती है। बशर्ते कंपनी के मेमोरेंडम में पहले से उसको निषेध करने वाला कोई प्रावधान न हो। इसके साथ ही एआइसीटीई ने हर पाठ्यक्रम के लिए निश्चित 40 सीटों को बढ़ाकर 60 करने का फैसला किया है। इस फैसले से इंजीनियरिंग में दो लाख, मैनेजमेंट में 80 हजार और आर्किटेक्चर में लगभग 20 हजार सीटें बढ़ने का अनुमान है। गौरतलब है कि देशभर में लगभग 8000 तकनीकी शिक्षण संस्थानों में 13.5 लाख सीटें इंजीनियरिंग और चार लाख प्रबंधन की सीटें है। मापदंडों में बदलाव की इस पहल में सरकार ने सार्वजनिक व निजी भागीदारी (पीपीपी) का भी रास्ता खोल दिया है। निर्माण संचालन व स्थानांतरण (बीओटी) का भी प्रावधान किया गया है। उसके तहत सरकार जमीन उपलब्ध कराएगी और निजी कंपनी उस पर तकनीकी शिक्षण संस्थान बनाएगी। लागत व अन्य खर्चों की अदायगी के बाद निजी कंपनी पूरा संसाधन सरकार को सौंप देगी। यह योजना उन 241 जिलों में अमल में आएगी, जहां अभी एआइसीटीई की मंजूरी वाले तकनीकी संस्थान नहीं हैं। अभी तक सिर्फ उन्हीं तकनीकी संस्थानों की दस प्रतिशत सीटें ट्यूशन फीस माफी के साथ आर्थिक रूप से कमजोर बच्चों (जिनकी सालाना आय 2.50 लाख से अधिक न हो) के लिए आरक्षित हैं, जिन्होंने इस योजना को अख्तियार किया है। अब सभी तकनीकी संस्थानों को पांच प्रतिशत सीटों पर आर्थिक रूप से कमजोर बच्चों को दाखिला देना जरूरी होगा, जिनसे कोई फीस नहीं ली जाएगी। इसके अलावा प्रबंधन में अब कोई भी पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा पाठ्यक्रम दो साल से कम का नहीं होगा। साथ ही प्रबंधन के किसी भी पाठ्यक्रम में दाखिले के लिए भी राज्य स्तरीय ठीक वैसी ही प्रवेश परीक्षा जरूरी होगी, जैसी अभी इंजीनियरिंग में दाखिले के लिए होती है।

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