राज्य सरकार के मार्च महीने तक 3613 चिकित्सकों की नियुक्ति करने के लक्ष्य पर राज्य स्वास्थ्य सेवा संघ ने शंका जतायी है। संघ ने कहा है कि चयन नीति एवं सेवा-शर्त बदले बिना रिक्त पदों को भरना आसान न होगा। विशेषज्ञ चिकित्सकों के 2136 पदों के लिए विज्ञापन निकाले गए, परन्तु इसके विरूद्ध मात्र पचास फीसदी आवेदन ही आए। हालांकि प्रदेश में डाक्टरों (आवेदकों) की कमी नहीं है। बिहार मेडिकल रजिस्ट्रेशन काउंसिल में हर वर्ष 900 डाक्टर निबंधन कराते हैं। पिछले दस साल में चयन योग्य करीब 9000 चिकित्सक उपलब्ध हैं। संघ के संयोजक डा.अजय कुमार के मुताबिक, राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन (एनआरएचएम) के तहत प्रदेश में 12000 चिकित्सकों की आवश्यकता है। वैसे, नियमित एवं संविदा डाक्टरों के स्वीकृत पदों की संख्या 8000 है, जिनमें से पचास प्रतिशत रिक्त हैं। स्वास्थ्य विभाग ने जिन 3613 चिकित्सकों की नियुक्ति की घोषणा की है, उनमें 2136 विशेषज्ञ चिकित्सक हैं। इन पदों के लिए अब तक पचास फीसदी आवेदन ही आए हैं। यही हाल मेडिकल कालेजों में होने वाली 699 रेजिडेंट डाक्टरों व ट्यूटरों की बहाली और संविदा के आधार पर 778 पदों पर होने वाले नियोजन का भी है। संघ के मुताबिक सरकार ने नियमित नियुक्ति के लिए ग्रामीण क्षेत्र में सरकारी सेवा के दो साल का अनुभव अनिवार्य कर रखा है। हालांकि अनुभव प्रदान करनेकी कोई व्यवस्था नहीं की गयी है। दूसरे राज्यों में एक साल के इंटर्नशिप के तुरंत बाद नियुक्ति होती है। नया वेतनमान अब तक लागू नहीं हुआ है। केन्द्र सरकार की तर्ज पर प्रोन्नति और सेवानिवृत्ति की आयु 65 साल करने की भी व्यवस्था नहीं की गयी है। सरकारी सेवा में अभी काम कर रहे चिकित्सकों में से करीब 50 प्रतिशत विशेषज्ञ हैं। इनका विशेषज्ञ संवर्ग में समायोजन नहीं हुआ है। ऐसी स्थिति देख प्रदेश के चिकित्सक अन्य राज्य चले जाते हैं। डा.कुमार ने कहा कि जब तक इन बातों पर ध्यान नहीं दिया जायेगा, प्रदेश में चिकित्सकों की कमी बनी रहेगी(दैनिक जागरण,पटना,6.12.2010)।
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