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15 दिसंबर 2010

मराठी अकादमी भाषाई स्तर से ऊपर उठकर काम करेगी

मराठी अकादमी के पहले निदेशक गणेश वागदरे का कहना है कि मराठी मानुस जहां बसता है उसी स्थान को अपनी मां मानता है। मप्र में मराठी लोग आकर बसे तो, मगर अब वह यहीं के होकर रह गए हैं। मराठी अकादमी पर यह जिम्मेदारी है कि वह केवल भाषा के स्तर तक सीमित न रहे, बल्कि मराठी संस्कृति के संरक्षण और विकास का भी कार्य करे। यह करने में हम सांस्कृतिक समरसता पर विशेष ध्यान देंगे। अकादमी द्वारा लोक कला, लोक साहित्य, संत परंपरा आदि पर वृहद स्तर पर काम किया जाएगा। इसके अलावा वह मराठी लेखक जिन्होंने हिंदी में विशेष योगदान दिया है जैसे हरिशंकर परसाई, सत्यदेव दुबे, शरद जोशी, माधवराव सप्रे आदि के लेखों को मराठी में अनुदित किया जाएगा। जनभागीदारी से करेंगे विकास श्री वागदरे का कहना है कि हम सरकार की सीमाएं समझते हैं। हमारा प्रयास रहेगा कि हम जनभागीदारी के माध्यम से ऐसे आयोजन करें जो लोगों के स्मृति पटल पर हमेशा अंकित रहें। बड़े आयोजन करने में अगर वित्तीय अड़चनें आती हैं तो हम जनभागीदारी से उन्हें पार कर सकते हैं। वैसे भी शुरुआती दौर में हम बड़े बजट की उम्मीद नहीं कर रहे हैं। अकादमी का स्वरूप भी हम ऐसा रखेंगे जिसमें प्रदेश के सभी अंचलों का प्रतिनिधित्व रहेगा। इसके लिए हम ग्यारह सदस्यीय सलाहकार मंडल का गठन करेंगे। स्थापित होंगे नए पुरस्कार मराठी संस्कृति के संवर्धन में सहयोग करने वालों के लिए कुछ नए पुरस्कारों की घोषणा किए जाने की प्रबल संभावनाएं हैं। अभी हम इसका प्रारूप तैयार कर रहे हैं। प्रदेश के सर्वमान्य नाम जैसे बाबा डीके, श्री सरवटे, मूर्तिकार फड़के, रामू भैय्या दाते तथा राहुल वारपुते आदि के नाम पर पुरस्कार शुरू किए जाने की योजना है। उल्लेखनीय है कि अभी प्रदेश में मराठी संस्कृति के नाम पर केवल एक भारा तांबे पुरस्कार ही दिया जाता है। इसके साथ ही हम मराठी अकादमी की एक त्रैमासिक पत्रिका भी शुरू करेंगे। हमने इसका नाम अर्थववाद पंजीयन के लिए दिल्ली भेजा हुआ है। स्वीकृत होते ही इसका प्रकाशन शुरू कर दिया जाएगा। हमारी कोशिश है कि इसके संपादकीय मंडल में प्रदेश के बड़े नामों को शामिल करें(शाहरोज आफरीदी,दैनिक जागरण,भोपाल,15.12.2010)।

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