कृषि विश्वविद्यालयों के कार्मिकों के वेतन व अन्य देयों का भुगतान करने के लिए मंडी परिषद से प्रत्येक वर्ष दी जाने वाली 45 करोड़ की आर्थिक सहायता को लेकर उत्तर प्रदेश मंडी परिषद कर्मचारी संघ ने विरोध जताया है। संघ ने राज्य कृषि उत्पादन मंडी परिषद के अध्यक्ष व कृषि विपणन मंत्री इंद्रजीत सरोज को प्रेषित पत्र में सवाल उठाया है कि किसानों के नाम पर अरबों की योजनाएं चलाने वाली सरकार कृषि विश्वविद्यालयों के 40-50 करोड़ का व्यय भार क्यों नहीं उठा सकती है।
संघ का कहना है कि कृषि विश्वविद्यालयों को आर्थिक सहायता दिया जाना न्यायालय में दिये गये शपथपत्र का भी उल्लंघन होगा, इसलिए ऐसा कदम नहीं उठाया जाना चाहिए। संघ के अध्यक्ष आरके निगम और महामंत्री बंशीलाल यादव के संयुक्त हस्ताक्षर से मंडी परिषद अध्यक्ष को प्रेषित पत्र में कहा गया है कि मंडी समितियों से वसूले जाने वाले मंडी शुल्क की 10 प्रतिशत राशि परिषद अंशदान के रूप में प्राप्त करता है। इसी राशि से परिषद के व्यय पूरे किये जाते हैं। परिषद के नियमों का उल्लेख करते हुए कहा गया कि 'मंडी परिषद की निधि' का उपयोग केवल मंडी परिषद के अधिष्ठान में ही किया जा सकता है। कृषि या प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालयों के शिक्षकों व कर्मचारियों के वेतन भुगतान के लिए निधि के उपयोग का मंतव्य त्रुटिपूर्ण होगा।
पत्र में कहा गया है कि मंडी समितियों से वसूली गई राशि के व्यय के संदर्भ में उच्च न्यायालय एवं सर्वोच्च न्यायालय में शपथपत्र दिया जा चुका है। इस शपथपत्र में उल्लेख है कि वसूली गई राशि का 60 फीसदी हिस्सा किसानों और गांवों के विकास कार्यो में तथा शेष राशि का उपयोग परिषद से जुड़े विभिन्न कार्यो में किया जाता है। ऐसे में यदि वसूली गई राशि का उपयोग कृषि विश्वविद्यालयों की आर्थिक मदद के लिए होगा तो यह कार्य एक प्रकार से शपथपत्र के अनुरूप नहीं होगा।
यह भी कहा गया है कि मंडी परिषद और मंडी समितियों के कार्मिकों को अभी पूरी तरह से पंचम वेतनमान पुनरीक्षण के लाभ व एरियर भी नहीं प्रदान किये गये हैं है। छठे वेतनमान की प्रक्रिया चल रही है। इन परिस्थितियों को देखते हुए कृषि विश्वविद्यालयों को आर्थिक सहायता दिया जाना तर्कसंगत नहीं होगा(दैनिक जागरण,लखनऊ,8.12.2010)।
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