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08 दिसंबर 2010

लेक्चरर बनने के लिए करना ही होगा नेट पास

कॉलेज में पढ़ाने के लिए अब एम.फिल व पीएचडी की डिग्री से काम नहीं चलेगा। दिल्ली उच्च न्यायालय ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) की उस नीति पर अपनी मुहर लगा दी है जिसमें उसने लेक्चरर की नौकरी के लिए राष्ट्रीय शिक्षण पात्रता (नेट) पास करने को अनिवार्य बना दिया है। मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा व न्यायमूर्ति मनमोहन की खंडपीठ ने कहा कि उच्च शिक्षा में एकरूपता व गुणवत्ता बनाए रखने के लिए यह परीक्षा जरूरी है। चूंकि अलग-अलग विवि एम.फिल व पीएचडी की डिग्री देते समय अलग-अलग मापदंड अपनाते है। अलग-अलग विवि द्वारा ली गई परीक्षाओं के परिणाम भी अलग-अलग होते है। जो न तो विश्वसनीय होते है और न ही तुलनात्मक। इसलिए उच्च शिक्षा में गुणवत्ता बनाए रखने और लेक्चरर बनने वाले उम्मीदवारों के शैक्षणिक स्तर के लिए एक राष्ट्रीय मापदंड बनाने के उद्देश्य से यूजीसी ने नियमावली 2009 जारी किया है। अदालत ने यह आदेश ऑल इंडिया रीसर्चर कोर्डिनेशन कमेटी की याचिका पर दिया है। जिसमें यूजीसी द्वारा जारी नियमावली 2009 को चुनौती दी थी। इस नियमावली के अनुसार लेक्चरर बनने की योग्याताओं में बदलाव कर दिया गया था। इसके अनुसार जो लोग नेट पास करेंगे वही लेक्चरर बन पाएंगे। इस कमेटी का कहना था कि नई नियमावली 2006 के नियमावली की विरोधाभासी है। जिसके अनुसार जिस उम्मीदवार के पास एम.फिल या पीएचडी की डिग्री है वह लेक्चरर बन सकताहै। अदालत ने इस याचिका को खारिज करते हुए कहा कि यूजीसी ने यह निर्णय कई विशेषज्ञों की कमेटी की सिफारिशों पर लिया है। जिसमें पाया गया है कि अलग-अलग विवि एम.फिल या पीएचडी की डिग्री देते समय अलग-अलग मापदंड अपनाते है और उनमें अनियमितताएं है। अदालत ने कहा कि उन्हें नही लगता है कि वह उस नीति के ज्ञान या बुद्धिमता पर सवाल उठाए जो मानव संसाधन व विकास मंत्रालय के निर्देश पर बनाई गई है और विशेषज्ञों की कमेटी (मुंगेरकर कमेटी) की अनुशंसा पर आधारित है(दैनिक जागरण,राष्ट्रीय संस्करण,8.12.2010)।

दैनिक भास्कर की रिपोर्टः
किसी कालेज में व्याख्याता बनने के लिए सिर्फ एम फिल या पीएचडी करना ही पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि उन्हें इसके लिए राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा (नेट) उत्तीर्ण करना होगा। दिल्ली हाईकोर्ट ने मंगलवार को यूजीसी की नीति को बरकरार रखते हुए यह फैसला सुनाया है।

चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा और जस्टिस मनमोहन सिंह की खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा कि उच्च शिक्षा में एकरूपता और गुणवत्ता बनाए रखने के लिए परीक्षा जरूरी है क्योंकि एमफिल या पीएचडी की डिग्री देने के लिए विभिन्न विश्वविद्यालय अलग-अलग मानदंड अपना रहे हैं।

हाईकोर्ट ने कहा कि विभिन्न परीक्षा निकायों द्वारा संचालित परीक्षा के परिणाम अलग-अलग विश्वविद्यालयों में अलग-अलग होते हैं और इसलिए न तो वे विश्वसनीय हैं और न ही समानता करने योग्य, इसलिए व्याख्याता बनने की उम्मीद रखने वाले प्रत्येक उम्मीदवार के लिए राष्ट्रीय मानदंड पर खरा उतरने और उच्च शिक्षा की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए यूजीसी ने साल 2009 में नियम जारी किए थे।

अखिल भारतीय अनुसंधान एवं समन्वय समिति की याचिका पर खंडपीठ ने यह आदेश पारित किया है।

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एम.फिल और पीएचडी की डिग्री अब लेक्चरर बनने के लिए पर्याप्त नहीं है। दिल्ली हाईकोर्ट ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) की उस नीति को सही ठहराया है जिसके तहत कॉलेज में लेक्चरर बनने के लिए नेशनल इलिजीबिलिटी टेस्ट (नेट) पास करना जरूरी है।

चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा और न्यायमूर्ति मनमोहन की खंडपीठ ने कहा है कि उच्च शिक्षा में गुणवत्ता और समानता बनाए रखने के लिए यह परीक्षा बहुत जरूरी है। विश्वविद्यालय द्वारा एम फिल या पीएचडी की डिग्री प्रदान करने का अपना अलग-अलग मापदंड होता है। विभिन्न परीक्षाओं के परिणाम भी अलग-अलग विश्वविद्यालय में भिन्न होते हैं।

ऐसे में इन परीक्षाओं से संबंधित मामलों की तुलना एक-दूसरे से नहीं की जा सकती। जिस कारण लेक्चरर बनाने के लिए एकसमान मापदंड का उद्देश्य पूरा नहीं हो पाता है। उच्च शिक्षा के लिए गुणवत्ता अधिकतम स्तर पर होनी चाहिए। लिहाजा वर्ष २००९ में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा इस संबंध में बनाए गए नियम सही हैं।

न्यायालय ने यह आदेश ऑल इंडिया रिसचरर्स कोऑरडिनेशन कमेटी की याचिका पर दिया है। याचिका में आयोग के इस नियम को चुनौती दी गई थी। इस नियम के लिए लेक्चरर बनने के लिए नेट पास करना जरूरी है।

कमेटी ने याचिका में कहा है कि आयोग का यह नियम वर्ष २००६ के कानून के विपरीत है। वर्ष २००६ के नियम के तहत एम.फिल और पीएचडी डिग्री धारक भी लेक्चरर बन सकते हैं।

कमेटी की याचिका खारिज करते हुए खंडपीठ ने कहा कि यूजीसी ने यह निर्णय विशेषज्ञों की समितियों के सुझावों के बाद लिया है। समितियों ने पाया कि विभिन्न विश्वविद्यालयों में एम.फिल और पीएचडी डिग्री प्रदान करने का तौर तरीका अलग है। साथ ही उनमें अनियमितताएं भी हैं। खंडपीठ ने यह भी कहा कि विशेषज्ञों की समितियों की सिफारिशों के आधार पर मानव संसाधन एवं विकास मंत्रालय ने यह नियम बनाया है, लिहाजा अदालत को इस पर सवाल नहीं खड़े करने चाहिए।

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