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21 दिसंबर 2010

महाराष्ट्रःएसएनडीटी यूनिवर्सिटी को अपने कॉलेजों,शिक्षकों और छात्राओं की संख्या पता नहीं

इसे कहते हैं चिराग तले अंधेरा। लाखों महिलाओं को ज्ञान बांट रही मरीन लाइंस स्थित एसएनडीटी यूनिवर्सिटी खुद अपने बारे में निरक्षरता की हद तक अज्ञानी है। यूनिवर्सिटी प्रशासन को यह तक नहीं पता कि इसके अधीन कितने कॉलेज हैं। उसे यह भी जानकारी नहीं कि कितने टीचर विश्वविद्यालय से जुड़े हैं और कितनी छात्राएं अध्ययन कर रही हैं।
एक आरटीआई अर्जी के जवाब में यूनिवर्सिटी ने यह अजीबोगरीब स्वीकारोक्ति की है। अनिल गलगली द्वारा मांगी गई जानकारी के जवाब में यूनिवर्सिटी ने कहा है कि मांगा गया आंकड़ा बहुत विस्तृत है। इसे देखने के लिए आपको व्यक्तिगत रूप से आना होगा। अर्जी में यूनिवर्सिटी से पूछा गया था कि भारत में इसके कितने कैंपस हैं और इनमें कितने प्रिंसिपल, विभागाध्यक्ष, प्रफेसर, असोसिएट प्रफेसर और लेक्चरर आदि हैं। इनमें से कितने स्थाई या अस्थाई हैं, इसकी सूचना भी मांगी गई थी। विभागवार छात्रों की तादाद के बारे में भी पांच सालों का डेटा इस आवेदन में मांगा गया था।
महर्षि कर्वे द्वारा पुणे में 1916 में स्थापित की गई भारत की यह पहली महिला यूनिवर्सिटी आज महज ऐतिहासिक नाम को ढो रही है। देश के कई राज्यों में फैला विश्वविद्यालय लाखों महिलाओं को औपचारिक और अनौपचारिक शिक्षा देता आ रहा है। यूनिवर्सिटी सूत्रों के अनुसार, 200 से अधिक कॉलेज इससे जुड़े हैं। लेकिन 40 प्रतिशत कॉलेजों में स्थाई प्रिंसिपल, अध्यापक और विभागाध्यक्ष तक नहीं है। ज्यादातर विभाग अस्थाई प्रफेसरों के सहारे चलाए जा रहे हैं।

कॉलेज के एक पूर्व विभागाध्यक्ष के मुताबिक, 'इनमें से कई इतने अयोग्य हैं कि किसी स्कूल में भी अर्जी भेजें तो रिजेक्ट हो जाएं। यूनिवर्सिटी को फायदा यह है कि अस्थाई लोगों को इन्हें छठे वेतन आयोग की सैलरी नहीं देनी पड़ती। ज्यादा जोर फाइनेंशल एड वाले कोर्सों पर है जिसके जरिए कमाई हो सके।' जुहू कैंपस की कुछ छात्राओं ने एनबीटी को बताया, 'भारी फीस के बावजूद यहां न तो पढ़ाई होती है और न ही प्रैक्टिकल। लेक्चरर न होने से ज्यादातर पीरियड खाली जाते हैं। बावजूद इसके कई विभागों को आईएसओ और नैक के सर्टिफिकेट तक मिले हैं।' 
स्टाफ का इस कदर अकाल है कि एक आरटीआई का जवाब देने में भी यूनिवर्सिटी को 67 दिन लग गए। गलगली के मुताबिक, 'आरटीआई नियमों के तहत किसी भी संस्थान को पहली सूचना 30 दिन के भीतर देनी होती है। लेकिन मुझे यह 67 दिन बाद दी गई वह भी जवाब के बगैर। यूनिवर्सिटी सामान्य रेकॉर्ड तक मेंटेन नहीं करती, तो बाकी का हाल क्या होगा, समझा जा सकता है।' गलगली ने देर से जवाब देने के खिलाफ अपील भी की है। 
बॉक्स : कई साल से अपडेट नहीं हुई वेबसाइट 
यूनिवर्सिटी की वेबसाइट www.sndt.ac.in दो साल से अपडेट नहीं हुई। कई फीचर्स तो 2004-05 के हैं। मसलन होम पेज कहता है कि एसएनडीटी के चर्चगेट , जुहू और पुणे में तीन कैंपस हैं। जबकि पालघर और अहमदाबाद में भी कैंपस खोले जा चुके हैं। दूसरी कई सूचनाएं भी भ्रामक और प्राचीन हैं। 
बॉक्स : एमकेसीएल ने किया किनारा तो बना ली नई वेबसाइट 
इस बारे में वाइस चांसलर डॉ चंद्रा कृष्णमूर्ति ने सफाई दी , ' हमारी वेबसाइट www.sndt.ac.in एमकेसीएल ( महाराष्ट्र नॉलेज कॉर्पोरेशन लि. ) मेंटेन कर रहा था लेकिन फिलहाल विवाद के चलते कंपनी ने इसे अपडेट नहीं किया है। मामला सुलझा नहीं इसलिए हमने नई वेबसाइट www.sndtwomensuniversity.in/ बना ली है। ' इसका लिंक पुरानी वेबसाइट पर क्यों नहीं दिया गया ? सवाल के जवाब में कृष्णमूर्ति ने अफसोस के साथ कहा कि एमकेसीएल यह भी करने को राजी नहीं है। दिलचस्प है कि ताजा वेबसाइट भी केवल कामचलाऊ है(नवभारत टाइम्स,मुंबई,21.12.2010)। 

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