मुख्य समाचारः

सम्पर्कःeduployment@gmail.com

18 जनवरी 2011

लखनऊ विविःक्या छात्र उठाएंगे वेतन का बोझ?

छठे वेतन आयोग ने लखनऊ विश्वविद्यालय को लगभग दिवालिया बना दिया है। पहले से ही आर्थिक तंगी का सामना कर रहे लविवि प्रशासन के लिए अब वेतन का भुगतान करना भी टेढ़ी खीर साबित हो रहा है। यही वजह है कि अब विवि प्रशासन गुपचुप तरीके से अपने बजट में कटौती के रास्ते तलाशने में जुट गया है। इसके लिए कुछ विशेषज्ञों की भी मदद ली जा रही है। हालांकि जानकारों का मानना है कि यदि शासन से अतिरिक्त मदद नहीं मिली तो अगले सत्र से शुल्क वृद्धि तय है। छठा वेतन आयोग लागू होने के बाद शिक्षकों की बल्ले-बल्ले तो हो गई लेकिन इसने विवि की मुसीबतें बढ़ा दी हैं। नए वर्ष में शिक्षकों के वेतन में हुई बढ़ोतरी ने आग में घी डाल दिया है। शासन से मिलने वाला अनुदान कम पड़ रहा है। वेतन का कुछ बोझ कम करने के लिए विवि प्रशासन ने सैकड़ों कर्मचारियों को गुपचुप नियत वेतन पर कर डाला, लेकिन विरोध के बाद विवि प्रशासन को पीछे हटना पड़ा। यह दांव खाली जाने के बाद विवि में बजट को लेकर उधेड़बुन और तेज हो गई है। कोई रास्ता न सूझने पर अब फीस बढ़ाने पर विचार किया जा रहा है। कमेटी बनाकर स्ववित्तपोषी कोर्सेज के फी-स्ट्रक्चर में बढ़ोत्तरी की गुंजाइश तलाशी जा रही है। नियमित कोर्सेज की फीस बढ़ाना भी मजबूरी बन रहा है। विश्र्वविद्यालय प्रशासन शिक्षकों के अतिरिक्त मदों में भी कटौती करने का विचार कर रहा है ताकि खर्चो को बजट की सीमा में लाया जा सके। घाटा दर घाटा शासन से लविवि को सालाना 36 करोड़ रुपये अनुदान मिलता है और तकरीबन 30 करोड़ रुपये शुल्क के तौर पर कमाई के रूप में आता है। वहीं शिक्षकों के वेतन में सालाना 60 करोड़ रुपये खर्च होते है। विवि का अन्य मदों का खर्च 10 करोड़ रुपये है। विवि के लिए इस घाटे से उबरना काफी मुश्किल भरा हो रहा है। अब शिक्षकों के वेतन में तीन प्रतिशत की बढ़ोत्तरी होने से विवि पर अतिरिक्त बोझ पड़ेगा, जिसको झेलना खासा मुश्किल है(पारितोष मिश्र,दैनिक जागरण,लखनऊ,18.1.11)।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

टिप्पणी के बगैर भी इस ब्लॉग पर सृजन जारी रहेगा। फिर भी,सुझाव और आलोचनाएं आमंत्रित हैं।