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18 जनवरी 2011

छत्रपति शाहूजी महाराज विश्वविद्यालय में फेल को पदक विजेता बनाने का शर्मनाक मामला

कानपुर के छत्रपति शाहूजी महाराज विश्वविद्यालय में फेल छात्रों को पदक विजेता छात्रों की सूची में शामिल करने का मामला यह बता रहा है कि यह विश्वविद्यालय सुधार की जिस राह पर चलता हुआ दिख रहा है वहां से वह फिर से उस दौर में पहुंच गया है जहां हर तरीके की अनियमितताएं संभव थीं। फेल छात्रों को स्वर्ण पदक पाने वाले छात्रों की सूची में शामिल किए जाने को भूल-चूक की संज्ञा इसलिए नहीं दी जा सकती, क्योंकि इसमें ऐसे छात्रों के नाम शामिल हैं जिनमें कुछ के अभिभावक इसी विश्वविद्यालय में महत्वपूर्ण पदों पर काबिज हैं। इसका अर्थ साफ है कि फेल छात्रों को पुरस्कृत करने की पूरी तैयारी कर ली गई थी। ऐसा लगता है कि गड़बड़ी करने वाले इस हद तक मनमानी करने के लिए आश्वस्त थे कि उनके कारनामे के खिलाफ कहीं कोई आवाज नहीं उठेगी। यह गनीमत है कि आवाज उठी और उस पर सुनवाई हुई, लेकिन बात तब बनेगी जब ऐसी सूची तैयार करने वालों को दंडित किया जाएगा। चूंकि कानपुर विश्वविद्यालय में इतनी बड़ी खामी सामने आ चुकी है इसलिए इसकी आशंका स्वाभाविक है कि इस विश्वविद्यालय में अन्य अनेक कार्य भी इसी तरह मनमाने ढंग से किए जा रहे होंगे। लज्जाजनक यह है कि यह कारनामा ऐसे कुलपति के विश्वविद्यालय में हुआ जो उत्तर प्रदेश में उच्च शिक्षा का स्तर सुधारने के लिए गठित की गई समिति के अध्यक्ष हैं। यह समझा जा सकता है कि यह समिति विश्वविद्यालयों में शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के संदर्भ में क्या कुछ करने में समर्थ होगी? आम तौर पर उत्तर प्रदेश के विश्वविद्यालयों की अनियमितताएं तब चर्चा में आ पाती हैं जब वे सुर्खियां बन जाती हैं। यथार्थ यह है कि इस तरह की अनियमितताओं का सिलसिला हर कहीं कायम है और यही कारण है कि अधिकांश विश्वविद्यालय अपनी प्रतिष्ठा खोते जा रहे हैं। राज्य सरकार यदि वास्तव में उच्च शिक्षा की स्थिति सुधारने के लिए गंभीर है तो उसे न केवल उनमें पठन-पाठन के स्तर को ऊंचा करना होगा, बल्कि ऐसी कोई व्यवस्था भी करनी होगी जिससे उस तरह की गड़बडि़यों की गुंजाइश ही न रहे जैसी कानपुर विश्वविद्यालय में हुई(संपादकीय,दैनिक जागरण,लखनऊ,18.1.11)।

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