दिल्ली नगर निगम में चल रहे घोटालों का दौर थमने का नाम नहीं ले रहा। कम्प्यूटर शिक्षा और बिना टेंडर पार्किंग घोटालों से पर्दा उठने के बाद अब प्राथमिक विद्यालयों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों को बांटी जाने वाली कापियों की खरीद में भी बड़ा घोटाला सामने आया है। इस मामले में सबसे खास बात यह कि अधिकारियों ने नगर निगम से इसकी अग्रिम स्वीकृति ले ली है और अब स्थायी समिति की स्वीकृति के लिए प्रस्ताव भेजने की तैयारी है।
अधिकारियों ने सात करोड़ रुपए की कापियां खरीदने के लिए टेंडर जारी कर दिए हैं। आश्चर्य की बात यह है कि इसके लिए कागज के वजन, आकार और बाइंडिंग के मानकों तक का उल्लेख नहीं किया गया। जबकि सरकारी व निजी तौर पर किसी भी वस्तु की खरीदारी के ठेके देने के लिए पहले इसमें उसके तकनीकी विवरण और संबंधित अन्य जरूरतें तय की जाती हैं।
कॉपी खरीदने के इस मामले में दिल्ली नगर निगम के शिक्षा विभाग के आला अधिकारियों की मिलीभगत बताई जा रही है। सूत्र बताते हैं कि ऐसा नगर निगम में सत्ता पक्ष के एक बड़े नेता के चहेतों को फायदा पहुंचाने के लिए किया गया है। यह नेताजी निगम में प्रमुख पदों पर रह चुके हैं और कुछ बड़े अधिकारियों के खासे नजदीक बताए जा रहे हैं। यह वही नेताजी हैं जिनके इशारे पर हाल ही में बिना टेंडर के पार्किंग के ठेके दे दिए गए। इससे पहले उन्होंने पांच गुना दरों पर अपनी चहेतों की कंपनियों को प्राथमिक विद्यालयों में कम्प्यूटर शिक्षा के ठेके दिलाने का प्रस्ताव पास करा दिया था।
बिना कोई मानक तय किए टेंडर भरने वालों में से चहेती कंपनियों को कापी आपूर्ति का ठेका देना आसान होगा। क्योंकि वह दूसरी कंपनियों के मुकाबले प्रतिस्पर्धा में कम दरें "कोट" करेंगे। दूसरे ठेका देने के बाद आपूर्ति करने वाली कंपनी अपनी मनमर्जी के मुताबिक कापियों की गुणवत्ता, आकार, बाइंडिंग आदि में जितनी चाहे कमी की जा सकती है। इसका फायदा कंपनी और शिक्षा विभाग के अधिकारी मिलकर आगे भी उठा सकेंगे।
दरअसल नगर निगम द्वारा अपने पांचवीं कक्षा तक के विद्यालयों में पढ़ने वाले छात्र-छात्राओं को किताबें और कापियां निःशुल्क दी जाती हैं। इसके लिए नगर निगम द्वारा टेंडर जारी कर कापियों की खरीदारी की जाती है(हीरेन्द्र सिंह राठौड़,नई दुनिया,दिल्ली,17.1.11)।
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