शासन में हर दिन हाजिरी लगाने से चूके सरकारी डिग्री कालेज जो दर्द का गुबार छिपाए हैं, वह सरकार और महकमे की खुमारी उतारने को काफी है। यह जवाब भी आसानी से मिल जाएगा कि साक्षरता और उच्च शिक्षा में कमोबेश बेहतर दिखने वाले उत्तराखंड के छात्र-छात्राएं प्रतियोगी परीक्षाओं में क्यों पिछड़ जाते हैं। फैकल्टी, लाइब्रेरी, भवनों के बगैर कालेज विद्यार्थियों को रेवडि़यों की तरह डिग्रियां तो बांट रहे हैं, लेकिन कुछ कर गुजरने की चाह में सिसकती आंखों से आंसू नहीं पोंछते। प्रदेश की उच्च शिक्षा के मुंह बाए खड़े ऐसे कई तीखे सवालों का जवाब खोजने की अनूठी कोशिश की है सूबे के मुख्यमंत्री डा. रमेश पोखरियाल निशंक ने। मुख्यमंत्री के निर्देशों राज्य के 70 सरकारी डिग्री कालेजों का जायजा लेने को गठित समिति की प्रारंभिक रिपोर्ट उच्च शिक्षा की सच्चाई को उधेड़ने को काफी है। मुख्यमंत्री के उच्च शिक्षा सलाहकार डा. एमएम करगेती के नेतृत्व में डा. डीके पांडे, डा. यतीश वशिष्ठ समेत चार सदस्यीय टीम अब तक गढ़वाल मंडल के सभी 39 कालेजों और कुमाऊं मंडल के 24 कालेजों का मुआयना कर चुकी है। कुमाऊं मंडल के सात कालेजों का ही मुआयना शेष है। सच सामने आ सके, लिहाजा समिति ने पर्वतीय क्षेत्र के सभी दुर्गम कालेजों की खाक छानी। सत्तर फीसदी कालेजों सेंटर ऑफ एक्सीलेंस तो दूर आम स्तर पर भी खरा नहीं उतरते। डेढ़ दर्जन कालेजों के पास अपने भवन नहीं हैं। तकरीबन इतने ही कालेजों के भवनों की गुणवत्ता से खिलवाड़ किया गया है। निर्माण एजेंसियों के इस खेल को लेकर सरकार अभी तक आंखें मूंदे है। शासन, उच्च शिक्षा निदेशालय और कालेजों के बीच संवाद की कमी का अंदाजा इससे लग सकता है कि तकरीबन 20 कालेजों में टेलीफोन, बिजली का पर्याप्त बंदोबस्त नहीं है। ऐसे में हर दिन शासन में हाजिरी लगाने के फरमान को लेकर कालेज प्रशासन सिर्फ खुद को कोसकर रह गया। गढ़वाल में अगरोड़ा, लंबगांव, पौखाल, नैनीडांडा, थलीसैंण, मजरा महादेव, रिखणीखाल और त्यूणी के कालेजों में दूरसंचार महकमा टेलीफोन लाइन बिछाने को ही तैयार नहीं। उसे लाइन बिछाने से पहले आठ-दस नए कनेक्शन चाहिए। इन कालेजों में फैक्स व इंटरनेट की बात ही बेमानी है। तकरीबन दर्जन से ज्यादा कालेजों में कंप्यूटर शिखर योजना फ्लॉप शो है। थत्यूड़ का कालेज प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में चल रहा है। इसे विश्र्वविद्यालय से मान्यता नहीं मिली। कुमाऊं मंडल में जैंती, बलवाकोट, नारायणनगर, बेरीनाग, दोसापानी, गरुड़ाबांज, गरुड़ के कालेज जरूरी सुविधाओं के मोहताज हैं। कई कालेजों में टेलीफोन और बिजली सुविधा नहीं है। गैरसैंण और जैंती के भवन आवासीय इलाके से इतनी दूर हैं कि वहां विद्यार्थियों के समक्ष कालेज पहंुचने और फिर लौटने की समस्या बनी है। यह हाल कई कालेजों के हैं। दोनों ही मंडलों में दूरदराज के अधिकतर कालेजों में छात्राओं की तादाद 60 से 70 फीसदी तक है। छात्रावास नहीं हैं। छात्राएं सुरक्षित वापस लौटें, इसके लिए कालेज सिर्फ बसों के चलने और लौटने की अवधि में ही लगता है। कालेजों में फैकल्टी के साथ ही लाइब्रेरी, रीडिंग रूम, लेबोरेट्री की कमी है। स्नातकोत्तर कालेजों की स्थिति कुछ हद तक दुरुस्त है, लेकिन इनमें गिने-चुने ही सेंटर आफ एक्सीलेंस बनने की कुव्वत रखते हैं। समिति को भरोसा है कि मुख्यमंत्री के इस कदम से सूरतेहाल बदलेगी(रविंद्र बड़थ्वाल,दैनिक जागरण,देहरादून,17.1.11)।
बहुत सही!
जवाब देंहटाएंसहमत हू इस आलेख से!