उत्तर प्रदेश में प्राथमिक विद्यालयों में स्नातक शिक्षा मित्रों की नियमित शिक्षकों के रूप में नियुक्ति का जो फैसला हुआ और उसे राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद ने अपनी मंजूरी दी उसके पीछे एक प्रकार की मजबूरी तथा विकल्पहीनता की स्थिति नजर आती है। जो भी हो, लगभग सवा लाख स्नातक शिक्षा मित्रों को नियमित शिक्षक के रूप में नियुक्त करने का निर्णय एक बड़ा कदम है, लेकिन यह कहना कठिन है कि इस बड़े कदम से कोई सकारात्मक और उल्लेखनीय असर शिक्षा की गुणवत्ता पर नजर आएगा। अब जब राज्य सरकार ने स्नातक शिक्षा मित्रों को शिक्षक के रूप में नियुक्त करने का निर्णय ले लिया है और इसके चलते सार्वजनिक कोष पर एक बड़ा बोझ पड़ने जा रहा है तब उसे यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उत्तर प्रदेश में प्राथमिक शिक्षा की गुणवत्ता में वास्तव में सुधार हो। यह सुधार तभी संभव है जब स्नातक शिक्षा मित्रों को सही तरह प्रशिक्षण दिया जाएगा। यह आवश्यक है कि राज्य सरकार ऐसी व्यवस्था करे कि शिक्षा मित्रों का प्रशिक्षण उन मानकों के अनुरूप हो जो राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद ने निर्धारित किए हैं। उत्तर प्रदेश में प्राथमिक शिक्षा के ढांचे की दुर्दशा के तथ्य रह-रहकर सामने आते ही रहते हैं। अब तो यह भी सामने आ रहा है कि ग्रामीण क्षेत्रों में स्कूली शिक्षा के अनेक संकेतकों के मामले में उत्तर प्रदेश की स्थिति बिहार से भी खराब है। नई नियुक्तियों के साथ शिक्षकों का अभाव तो दूर किया जा सकता है, लेकिन इसकी सार्थकता तभी है जब राज्य सरकार उन सभी बुनियादी खामियों को प्राथमिकता के आधार पर दूर करने की पहल करेगी जो प्राथमिक शिक्षा के ढांचे को जर्जर बना रही हैं। जहां तक प्राथमिक विद्यालयों में शिक्षकों की नियुक्ति का प्रश्न है तो राज्य सरकार को इस पर ध्यान देना चाहिए कि स्नातक शिक्षा मित्रों की नियमित शिक्षक के रूप में नियुक्ति एक नजीर न बनने पाए, क्योंकि राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद ने भी कहा है कि भविष्य में किसी भी रूप में अप्रशिक्षित शिक्षकों की नियुक्ति नहीं की जानी चाहिए। बेहतर हो कि राज्य सरकार ऐसी कोई विधि सम्मत और पारदर्शी व्यवस्था करे जिससे शिक्षा मित्रों को सामान्य शिक्षकों के रूप में प्रोन्नति मिले(संपादकीय,दैनिक जागरण,17.1.11)।
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