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03 फ़रवरी 2011

कहां जाता है हमारे स्कूल का रास्ता?

सर्दी का दिन है । मैं पश्चिमी उत्तर प्रदेश के एक सरकारी प्राथमिक विद्यालय में हूं। लोग बताते हैं कि यह गांव मुख्यमंत्री मायावती के गांव से ज्यादा दूर नहीं है । विद्यालय के पीछे सरसों के लहलहाते खेत हैं । जैसे-जैसे धूप तेज हो रही है , सरसों के फूल और पीले दिखाई दे रहे हैं । बच्चे भी अपने गरम कपड़े उतार रहे हैं । मेरे सामने तीस बच्चे हैं। लड़कियां ज्यादा, लड़के कम। कुछ बच्चे कक्षा तीन के हैं , कुछ चार के और कुछ पांच के । छोटे बच्चे दूसरे कमरे में हैं । आज इस कक्षा में कोई शिक्षक नहीं है । विद्यालय इकलौते शिक्षक और दो शिक्षामित्रों के सहारे चलता है। शिक्षामित्र कि सी ट्रेनिंग के सिलसिले में बाहर हैं। बच्चे बताते हैं कि उनके क ई सहपाठी भी आज स्कूल नहीं आए। कुछ ठंड की वजह से, कुछ टीचर न होने के वजह से और कुछ घर के कामों की वजह से। चौथी के एक लड़के से मैं पूछती हूं, ‘अपनी किताब से कोई भी मनपसंद पाठ पढ़कर सुनाओगे?’ लड़का पाठ्यपुस्तक लेकर खड़ा तो हो जाता है, पर कुछ समय तक चुप रहता है । थोड़ी देर पन्ने उलटता है, फिर एक पाठ चुनता है, वीर अभिमन्यु के बारे में है ।

पाठ तीन पन्नों तक चलता है । खूब सारे कठिन शब्द और लम्बे-लम्बे वाक्य हैं । चक्रव्यूह , चक्करदार, युद्ध, विधि, विशेष़... लड़का पढ़ने की कोशिश करता है। लगभग हर शब्द पर वह अटक ता है । उसके लिए यह पाठ पढ़ पाना नामुमकिन है । सभी बच्चे खामोशी से सुन रहे हैं। डर भी रहे हैं , पता नहीं अब किसकी बारी होगी। मुझे साफ दिखता है कि इस रास्ते पर आगे चलने का कोई फायदा नहीं है। ‘चलो यह किताब रख देते हैं । एक दूसरी कहानी पढ़ते हैं।’ मेरे पास एक छोटी कहानी है । सरल शब्द, साधारण सन्दर्भ। कहानी का विषय- दो लड़कियां और बारिश का दिन। एक लड़का झट से कहता है, ‘यह कहानी मैं पढ़ सकता हूं।’ वह धीरे-धीरे पढ़ना शुरू करता है । यदा-कदा उसे किसी शब्द या वाक्य को दो बार पढ़ना पड़ता है , पर उसे और उसके दोस्तों को इत्मिनान है कि वह पढ़ सकता है । कहानी खत्म होते ही उसके चेहरे पर कामयाबी की मुस्कान चमकने लगती है। यह लड़का सफल हुआ, पर कक्षा के सभी बच्चे इस आसान कहानी को नहीं पढ़ पाते हैं । यह कहानी कक्षा दो के स्तर की है । चौथी के आधे बच्चे और पांचवी के लगभग तीस प्रतिशत बच्चे इस कहानी को नहीं पढ़ पाते हैं।

 ‘क्या तुम लोगों को खेलना अच्छा लगता है ?’ ‘हां, हां,’ बच्चे उत्साह से चिल्लाते हैं । ‘हां, हां,’ बच्चे उत्साह से चिल्लाते हैं । ‘इस खेल का नाम है ‘डबल-डबल’। किसी भी नंबर से शुरू करते हैं, फिर उसे डबल करते जाएंगे। डबल का मतलब पता हैं न?’ नीले स्वेटर वाली एक लड़की कहती है , ‘हां... जब हमारे घर में परांठे बनते हैं, तो मेरा भाई मुझसे डबल खाता है ।’ हम अपना खेल 2 से चालू करते हैं । 4, 8, 16... बच्चे एक दूसरे के साथ रेस लगा रहे हैं कि कौन पहले बताएगा। नंबर बढ़ रहे हैं ... 32, 64... और अब बच्चों की आवाजें धीमी और कम होती जा रही हैं । समय भी ज्यादा लग रहा है। जब तक हम 128 तक पहुंचते हैं , तब तक सिर्फ एक ही लड़का इस खेल को आगे बढ़ा पाता है । पूरी कक्षा में 30 बच्चे... पर हम लोग 256 से आगे नहीं बढ़ पाए। 

तीसरी कक्षा की गणित की किताब में सैकड़ा, हजार तक की संख्याओं के जोड़ -घटाने हैं, मगर ये बच्चे तो सौ के आगे की दुनिया से ही अनजान हैं ! बच्चों का उत्साह दिल को छू लेने वाला है । वे कितनी बेसब्री से सीखना चाहते हैं ! पर्याप्त धूप और पानी मिलने से सरसों के पौधे तेजी से बड़े हो रहे हैं । हमारे बच्चे भी बड़े हो रहे हैं , पर उनकी संतुलित बढ़वार के लिए हमारे पास ‘धूप और पानी’ नहीं है । इस कक्षा ने मुझे सोचने को मजबूर कर दिया। देश के विशेषज्ञों, नीति-निर्धारकों, शिक्षा व्यवस्था चलाने वालों और अंतत: अध्यापकों को भी इस बारे में गंभीरता से सोचना चाहिए। हमारे चारों तरफ क्या हो रहा है? हमारे बच्चे किताबी तथ्यों को बेशक नहीं जानते, मगर वे दुनिया के बारे में काफी कुछ जानते हैं । इससे भी महत्वपूर्ण है कि बच्चे सीखना चाहते हैं । हम आज जहां खड़े हैं, वहीं से हमें शुरु आत करनी होगी और आगे का रास्ता खोजना होगा। तभी हम सही ढंग से अपने बच्चों को पढ़ा पाएंगे और उन्हें सही मायने में शिक्षित कर पाएंगे। गांव से निकलने का रास्ता स्कूल के सामने से गुजरता है । मेरे आगे-पीछे बच्चों का छोटा-सा हुजूम घर जा रहा है । मुझे साफ सुनाई दे रहा है बच्चे घर जाते हुए भी डबल-डबल खेल रहे हैं (रुक्मिणी बनर्जी,हिंदुस्तान,3.2.11)

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