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04 फ़रवरी 2011

रांची विश्वविद्यालय में सर्टिफिकेट दिलाने के नाम पर गोरखधंधे का पर्दाफाश

रांची विश्वविद्यालय में सर्टिफिकेट निर्गत कराने के नाम पर चल रहे गोरखधंधे का पर्दाफाश गुरुवार को हुआ। इसकी जानकारी मिलते ही आरयू प्रशासन ने इस रैकेट में शामिल एक विवि कर्मी को निलंबित कर दिया साथ ही मुख्यालय के मेन गेट पर तैनात निजी सुरक्षा गार्ड को भी हटा दिया।

..नहीं मिला सर्टिफिकेट
डालटनगंज से आए दोनों छात्र सर्टिफिकेट नहीं मिलने के कारण काफी परेशान दिखे। दोनों छात्रों ने भास्कर प्रतिनिधि को बताया कि सर्टिफिकेट के लिए उन्हें एक दिन और रुकना पड़ेगा। सोचा था एक दिन में काम हो जाएगा तो घर लौट जाएंगे, लेकिन काम नहीं हुआ। अब शुक्रवार का इंतजार करना पड़ेगा। यहां कहां रहेंगे, पैसे भी खत्म हो चुके हैं।

माइग्रेशन के लिए क्या है नियम

रांची विवि में तत्काल माइग्रेशन सर्टिफिकेट लेने के 200 रुपए का चालान कटाना पड़ता है। इतने के चालान पर एक दिन में ही सर्टिफिकेट मुहैया करा दिया जाता है। वहीं 100 रुपए का चालान कटाने पर एक सप्ताह का समय लगता है।

कैसे हुआ खुलासा
गुरुवार की सुबह 10.30 बजे डालटनगंज से दो छात्र अजरुन कुमार और अरविंद कुमार रवि माइग्रेशन सर्टिफिकेट लेने आरयू मुख्यालय पहुंचे। वहां गेट पर तैनात निजी सुरक्षा गार्ड ने दोनों छात्रों से पूछा, क्या काम है। छात्रों ने बताया कि उन्हें तत्काल माइग्रेशन सर्टिफिकेट लेना 
है। 
इस पर गार्ड ने कहा कि एक दिन में बनाना है तो अतिरिक्त राशि देनी होगी। दूर से आने और जल्दबाजी की वजह से दोनों छात्र अतिरिक्तपैसा देने के लिए तैयार हो गए। इसके बाद सुरक्षा गार्ड दोनों छात्रों को लेकर विवि कर्मी अमृत बहादुर के पास ले गया। अमृत ने दोनों छात्रों से चार-चार सौ रुपए ले लिये। 

अपराह्न् तीन बजे तक सर्टिफिकेट नहीं मिलने पर दोनों छात्र अमृत को खोजने लगे, जो विवि परिसर में ही मिल गया। लेकिन, उस समय तक सर्टिफिकेट नहीं बना था। तब उसे दोनों छात्र प्रतिकुलपति के समक्ष ले गए। छात्रों की लिखित शिकायत पर अमृत बहादुर को तत्काल निलंबित कर दिया गया। अमृत बहादुर ने भी अपनी गलती स्वीकारी। हालांकि गार्ड ने अपनी संलिप्तता से इनकार किया है।

राशि आपस में बांट लेते थे
सुरक्षा गार्ड बाहर से आनेवाले छात्रों को सर्टिफिकेट दिलाने के नाम पर मुझसे मिलाता था। मैं छात्रों से उसकी जरूरत के हिसाब से अतिरिक्त राशि की वसूली करता था। इस धंधे में दीपक नाम का एक व्यक्ति भी शामिल है, जिसका भाई आरयू मुख्यालय में कार्यरत है। दीपक के सहयोग से छात्रों को वादे के अनुसार सर्टिफिकेट मुहैया करा दिया जाता था। जो राशि छात्रों से वसूलते थे, उसे हम तीनों आपस में बांट लेते थे। 
अमृत बहादुर, रांची विश्वविद्यालयकर्मी(दैनिक भास्कर,रांची,4.2.11)

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