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18 अप्रैल 2011

छत्तीसगढ़ से माय लॉर्ड की विदाई

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में अब ‘माय लॉर्ड’ की गूंज सुनाई नहीं पड़ेगी। हाईकोर्ट बार एसोसिएशन ने ब्रिटिश हुकूमत का प्रतीक मानकर इस संबोधन को आगे जारी नहीं रखने का फैसला किया है। इसकी जगह वकील अब सुनवाई के दौरान जजों को ‘सर’ या ‘श्रीमान’ कहकर संबोधित करेंगे।

एसोसिएशन ने यहां के आठ स्थानीय जजों के तबादले के लिए भी आवाज बुलंद की है।
हाईकोर्ट बार एसोसिएशन की रविवार को हुई कार्यकारिणी बैठक में ‘माय लॉर्ड’ नहीं बोलने का प्रस्ताव पारित किया गया। आजादी के बाद भी सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न हाईकोर्ट में न्यायाधीशों को ‘माय लॉर्ड’ या ‘योर लॉर्ड-शिप’ संबोधित करने की परंपरा जारी है, हालांकि संविधान या कानून में इसके लिए कोई बंधन नहीं है।

स्थानीय जजों का ट्रांसफर हो: एसोसिएशन ने हाईकोर्ट में पदस्थ स्थानीय जजों के ट्रांसफर की मांग भी की है। बैठक में कहा गया कि फिलहाल हाईकोर्ट में 11 जज पदस्थ हैं। इनमें से तीन को छोड़कर बाकी सभी छत्तीसगढ़ के ही हैं। न्यायपालिका की विश्वसनीयता प्रभावित न हो, इसके लिए सभी स्थानीय जजों का दूसरे राज्यों में तबादला किया जाना चाहिए।


बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने भी दिया था सुझाव: वर्ष 2006 में बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने भी यह तय किया था कि जजों को माय लॉर्ड कहने की परंपरा का पालन जरूरी नहीं है। उस समय यह प्रस्ताव सुप्रीम कोर्ट के साथ सभी हाईकोर्ट में भेजा गया था। हालांकि केरल और पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के अलावा इस पर कहीं अमल नहीं किया गया।

..और दुनिया में

दुनिया के ज्यादातर विकसित देशों में जजों को सिर्फ सर या मैडम कहकर ही सम्मान दिया जाता है। अमेरिकन कोर्ट में कई दशकों से यह सिस्टम लागू है। ब्रिटेन में भी माय लॉर्ड कहने की परंपरा खत्म होती जा रही है। वहां ज्यादातर वकील अब जजों को योर ऑनर कहकर संबोधित करते हैं। 

देश में तीसरा हाईकोर्ट 

माय लॉर्ड कहने से इनकार करने वाला छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट देश में तीसरा है। अप्रैल में पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट और जून 2007 में केरल हाईकोर्ट के वकीलों ने भी इस परंपरा को बदल दिया था। 2009 में मद्रास हाईकोर्ट के जस्टिस के चंद्रू ने सिर्फ अपनी अदालत में ‘माय लॉर्ड’ या ‘योर लॉर्ड-शिप’ बोलने पर रोक लगा दी थी।

लोकपाल के दायरे में हों जज :

न्यायपालिका को जन लोकपाल बिल के दायरे में लाने के लिए भी हाईकोर्ट बार एसोसिएशन आवाज बुलंद करेगा। 

एसोसिएशन के पदाधिकारियों ने कहा कि न्यायपालिका पर अंकुश नहीं होने से इसकी साख पर बट्टा लग रहा है। वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए न्यायाधीशों पर अंकुश रखने वाले कानून की भी जरूरत है। लोकपाल बिल के दायरे में लाने से न्यायपालिका में तेजी से बढ़ते भ्रष्टाचार पर लगाम लगेगी।

बीसीआई ने भी दिया था सुझाव

वर्ष 2006 में बार काउंसिल ऑफ इंडिया (बीसीआई) ने भी यह तय किया था कि जजों को माय लॉर्ड कहने की परंपरा का पालन जरूरी नहीं है। उस समय यह प्रस्ताव सुप्रीम कोर्ट के साथ सभी हाईकोर्ट में भेजा गया था। हालांकि केरल और पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के अलावा इस पर कहीं अमल नहीं किया गया।

"आजाद भारत में किसी को ‘माय लॉर्ड’ कहना अंग्रेजी शासन की याद दिलाता है। इस वजह से एसो. ने तय किया है कि यहां जजों को सर या श्रीमान कहकर ही सम्मान दिया जाएगा।"

अब्दुल वहाब खान, सचिव छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट बार एसो.(दैनिक भास्कर,बिलासपुर,18.4.11)

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