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19 अक्तूबर 2011

पढऩे के लिए दबाव नहीं, प्रेरित करें

बच्चों को न पढऩे की आदत माता-पिता के लिए तनाव का कारण होती है। उनमें पढऩे का शौक पैदा हो इसके लिए जरूरी है कि बच्चों के मनोविज्ञान को समझा जाए। आमतौर पर बच्चों को यदि पढऩे की ओर प्रेरित किया जाये तो उनमें धीरे-धीरे पढऩे की आदत विकसित होती है। इसलिए पढऩे की आदत बनाने के लिए माता-पिता को इसके लिए युद्धस्तर पर प्रयास करना होता है। एक बार बच्चा यदि पढ़ाई में रुचि लेने लगता है तो फिर उसे पढ़ाई आसान लगने लगती है, उसमें निरंतर अच्छा परफॉर्म करने की भावना शीघ्र से तीव्रतम हो जाती है।

बच्चों को स्कूल भेजने के साथ ही माता-पिता समझ लेते हैं कि अब बच्चे को शिक्षित करने की जिम्मेदारी स्कूल की है। हकीकत में ऐसा नहीं है। माता-पिता दोनों को ही बच्चों में पढ़ाई के प्रति रुचि पैदा करने के लिए अतिरिक्त प्रयास करने पड़ते हैं। इसके लिए घर का वातावरण ऐसा बनाया जाना चाहिए जिसमें बच्चा पढऩे की ओर प्रेरित हो। बच्चों को छोटेपन से ही इतर कहानियों की किताबें पत्र-पत्रिकाओं आदि को पढऩे के लिए प्रेरित करना चाहिए। जिस दौरान बच्चा इन किताबों को देख उस दौरान उनके इर्द-गिर्द रहना चाहिए और उनकी रुचि को समझना चाहिए। उन्हें पढऩे के लिए प्रोत्साहित करें। याद रखें बच्चा पढ़ाई से जुड़ी चीजें पढ़े या पढ़ाई से इतर चीजें पढ़े। बच्चे को पढऩे के लिए किसी तरह का कोई लालच न दें। बच्चे की शिक्षा से जुड़ी तमाम समस्याओं पर पूरा ध्यान दें। स्कूल में होने वाली पीटीएम में जरूर जाएं और उसकी क्लास टीचर व सब्जेक्ट टीचर से उसकी परफॉर्मेंस के विषय में बात करें। पीटीएम में बच्चे को जरूर साथ ले जाएं और बच्चे से उसकी समस्याओं को लेकर टीचर से बात करें। बच्चे की होमवर्क डायरी प्रतिदिन देखें। उसको दिये जाने वाले होमवर्क पर पूरा ध्यान दें। क्या बच्चा स्कूल से होमवर्क नोट करके लाता है? यदि लाता है तो क्या वह अपना होमवर्क समय पर पूरा करता है? उसकी कॉपियों की समय-समय पर जांच करें। कहीं वह अपने कामों को अधूरा तो नहीं छोड़ता? स्कूल में बच्चे के रूटीन के बारे में जानकारी हासिल करें। बच्चा जब स्कूल से लौटकर आये तो उसकी पढ़ाई के विषय में उससे बातचीत करें उससे उसके अनुभव बांटे।

बच्चे को उसकी उम्र और रुचि के अनुरूप उसे पढ़ाई से इतर सामग्री पढऩे दें। यदि उसे किसी खास खेल में रुचि है तो अखबार में उसे खेल संबंधित समाचार उसे पढ़कर सुनाएं। बच्चों की उनकी पसंद की कॉमिक्स, पंचतंत्र की कहानियां और ज्ञानवर्धक पुस्तकें लाकर दें। इन पुस्तकों को सिर्फ ला कर देने भर से ही माता-पिता की जिम्मेदारी खत्म नहीं हो जाती। उनके साथ बैठकर उन पुस्तकों की रीडिंग करें। बच्चे कहानी पढ़ें के लिए प्रेरित करने के लिए स्वयं भी कहानी पढ़ें और उसके साथ किसी कहानी के विषय में बातचीत करें। इससे उसमें जिज्ञासा पैदा होगी और वह स्वयं भी नयी-नयी पुस्तकों को पढऩे के लिए प्रयासरत होगा।

मनोविदों का मानना है कि माता-पिता जब बच्चों पर बार-बार पढऩे के दबाव डालते हैं तो बच्चों पर इस दबाव का कोई असर नहीं होता। वह धीरे-धीरे अनसुना कर देते हैं। बच्चों को पढऩे की ओर प्रेरित करने के लिए जरूरी है कि उसे बार-बार पढऩे के लिए लेक्चर न दें, उसे रिलैक्स रखें। बच्चा जिस समय अपने दोस्तों के साथ खेल रहा होता है, उसके खलने को लेकर उसको खरी-खोटी न सुनायें। ऐसा करने से बच्चे में हीनभावना आने लगती है और वह धीरे-धीरे कुंठा का शिकार हो जाता है। बच्चों के प्रति अपना रवैया हमेशा सकारात्मक रखें। बच्चों के दोस्तों के साथ उसे अपनी किताबें शेयर करने के लिए प्रेरित करें(नीलम अरोड़ा,दैनिक ट्रिब्यून,12.10.11)।

1 टिप्पणी:

  1. वातावरण बहुत कुछ प्रभाव डालता है पढ़ने की मानसिकता पर... अभिभावकों के साथ साथ मित्र-मण्‍डली भी उसी प्रकार की हो तो ज्‍यादा बेहतर बात है

    हिन्‍दी कॉमेडी- चैटिंग के साइड इफेक्‍ट

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