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31 अक्तूबर 2011

कब बहुरेंगे दिन विविद्यालयों के

उच्च शिक्षा को प्राथमिकता देने में हम कितने पीछे हैं यह क्यूएस टाइम्स हायर एजुकेशन रैंकिंग के परिणामों से साफ है। इस रैंकिंग में वि के शीर्ष 200 विविद्यालयों में एक भी भारतीय विविद्यालय या शिक्षण संस्थान नहीं है। रैंकिंग के परिणामों के मुताबिक टॉप 500 की सूची में 218वें नंबर पर आईआईटी-दिल्ली, 225वें स्थान पर आईआईटी-मुंबई और 281वें स्थान पर आईआईटी-मद्रास का नंबर आता है। गौरतलब है कि इन तीनों संस्थानों की रैकिंग पिछले साल क्रमश: 202, 187 और 262 थी। जाहिर है कि हम डाउनफॉल की हालत का सामना कर रहे हैं। यह सूची यह बताने के लिए काफी है कि क्यों नस्ली हमले सहकर भी लोग ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका में पढ़ते हैं और क्यों हमारे शिक्षा संस्थानों से कोई वेंकटरमण रामकृष्णन नहीं निकलता। बात यहीं खत्म नहीं होती। एशिया के शीषर्स्थ 200 विविद्यालयों में भारत का स्थान पांचवां है। सूची के करीब आधे विविद्यालय केवल दो देश चीन और दक्षिण कोरिया के हैं। ये दोनों देश इस मोच्रे पर दो दशक पहले भारत जैसे ही थे। साफ है कि उदारीकरण के बाद इन दोनों देशों ने अपनी शिक्षानीति में आमूलचूल बदलाए किए और हम केवल बातें ही बनाते रह गए। पिछले कुछ सालों का परिदृश्य देखें तो हमारे यहां केवल दोयम दज्रे के निजी विविद्यालय खुले हैं। विविद्यालयों की गुणवत्ता को लेकर अकसर यह तर्क सामने आता है कि गुणवत्ता का आधार दूसरे देश का कोई संस्थान नहीं हो सकता। ऐसा तर्क देने वालों का कहना है कि जब हमारे शिक्षण संस्थान देशी छात्रों और यहां की इंडस्ट्री की जरूरतों को पूरा कर रहे हैं तो रैंकिंग देने वाले हमें जहां भी रखें, क्या फर्क पड़ता है। जाहिर है ये तर्क वैीकरण के इस माहौल में बेजा ही कहे जा सकते हैं। आज हमारी अर्थव्यवस्था तमाम संकटों के बावजूद करीब 8 प्रतिशत की विकास दर से आगे बढ़ रही है। इस दर को स्थायी बनाना एक शक्ति केंद्र के रूप में देश को विकसित करना है तो यह ग्लोबल तौर-तरीकों की शिक्षा केंद्रों की स्थापना के बगैर पूरा नहीं हो सकता। बगैर आधुनिक शिक्षण संस्थानों के हम प्रतिभाशाली जनशक्ति हासिल नहीं कर सकते। ऐसा नहीं कि हमारे पास यह जनशक्ति नहीं है लेकिन उसे हमेशा कुछ बेहतर करने के लिए ऑक्सफोर्ड, येल और कैब्रिज आदि विविद्यालयों का रास्ता नापना होता है। आज हमारे शीर्ष केंद्रीय विविद्यालयों में भी डिग्री केंद्रित शिक्षा अर्जन का काम चल रहा है। आईआईटी और आईआईएम जैसे संस्थान भी मेधावी छात्रों के लिए बस अच्छी नौकरी पाने का जरिया बन गए हैं। हमारे यहां जो मुट्ठी भर छात्र रिसर्च कायरे में लगे हैं, वे भी मौका मिलते ही विदेश चले जाते हैं। केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय हमारे शिक्षण संस्थानों की बेहतरी के लिए जो कुछ कर रहा है उसे पर्याप्त नहीं कहा जा सकता। 11वीं पंचवर्षीय योजना में केंद्र सरकार ने 30 नए केंद्रीय विविद्यालय, आठ नए आईआईटी, सात नए आईआईएम, 37 अन्य तकनीकी संस्थान और जिला स्तर पर 373 नए कॉलेज स्थापित करने के लिए करीब 80,000 करोड़ रुपये का आबंटन किया था। औपचारिक रूप से शुरू की गई इनमें से ज्यादातर संस्थान विस्तरीय नहीं कहे जा सकते और न ही यहां हमारी जमीनी जरूरतों का लेकर कोई शोध ही किया जा रहा है। मानव संसाधन विकास मंत्रालय कितना ध्यान शोध पर दे रहा वह कुछ ही महीने पहले जारी इस फरमान से स्पष्ट हो जाता है कि जिसमें उसने शैक्षणिक संस्थानों को रिसर्च से जुड़े उपकरणों और रसायन आदि की खरीद की जिम्मेदारी लेने और विदेशों में रिसर्च पेपर पढ़ने के लिए स्पांसरशिप भी खुद ढूंढ़ने को कहा है। मंत्रालय संस्थानों को स्वाबलंबी बनाने के तर्क दे यह भूल रहा है कि टॉप 200 शिक्षण संस्थानों में अधिकांश सरकारी पैसे से चलते हैं। हां, यह जरूर है कि कई देशों में ऐसा ढ़ांचा विकसित किया गया है कि निजी कंपनियां भी बगैर किसी तरह के हस्तक्षेप के शिक्षण संस्थानों को पैसे डोनेट करती हैं। मंत्रालय इस तरह का ढ़ांचा विकसित करने में नहीं बल्कि सरकारी संस्थानों को कमजोर और निजी संस्थानों को मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। विदेशी संस्थानों के भारत आने का भी रास्ता खोला जा रहा है लेकिन सवाल है कि ये विदेशी संस्थान या निजी संस्थान रिसर्च जैसे क्षेत्र में क्यों पैसा लगाना चाहेंगी? वे तो सीधे-सीधे लाभ के लिए काम करेंगी और सभी को मालूम है कि रिसर्च जैसे कार्य में पैसा लगाना उनके लिए लाभप्रद सौदा किसी कीमत पर नहीं हो सकता। सरकार की तरफ से शोधपरक कायरें के लिए पैसे की कमी नहीं होनी चाहिए। प्राइवेट सेक्टर से ठीक वैसी ही मदद ली जानी चाहिए जैसे विदेशों में ली जाती है। उन्हें शिक्षण संस्थाओं को गोद लेने को कहा जा सकता है या फिर जो प्राइवेट कंपनी शिक्षण संस्थाओं को आर्थिक मदद प्रदान करे उन्हें टैक्स में राहत दी जा सकती है। दरअसल सरकार के पास उच्च शिक्षा के लिये पैसा लाने के लिए विकल्पों की कमी नहीं है लेकिन सवाल है कि आप चाहते क्या हैं? हमें अगले 20 सालों में कम से कम 50 विस्तरीय संस्थान खड़ा करने के लक्ष्य पर काम करना चाहिए(नीरज कुमार तिवारी,राष्ट्रीय सहारा,दिल्ली,31.10.11)।

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